
दीपंकर राय, जबलपुर। पैंक्रियास (अग्न्याशय) शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो भोजन पचाने वाले एंजाइम और ब्लड शुगर नियंत्रित करने वाले इंसुलिन का निर्माण करता है। इसमें होने वाली गंभीर सूजन (एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस) कभी-कभी दुर्लभ लेकिन जानलेवा स्थिति डिस्कनेक्टेड पैंक्रियाटिक डक्ट सिंड्रोम (डीपीडीएस) का कारण बन सकती है।
इसमें पैंक्रियास की नली का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर अलग हो जाता है और पैंक्रियाटिक जूस आसपास के अंगों, पेट या फेफड़ों में रिसने लगता है। यह तरल जिस हिस्से में पहुंचता है, वहां नुकसान और संक्रमण का खतरा पैदा कर सकता है।
गैस्ट्रोएंट्रोलाजिस्ट डाॅ. आलोक बंसल के अनुसार, इस स्थिति में लगातार बुखार आना, हृदय गति बढ़ना, भूख न लगना, सांस फूलना, बार-बार दस्त होना और तेजी से वजन कम होना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
पेट या फेफड़ों में असामान्य रूप से तरल जमा होना भी इसका संकेत हो सकता है। कई बार संक्रमण इतना गंभीर हो जाता है कि सामान्य दवाओं से भी राहत नहीं मिलती। ऐसे लक्षणों को सामान्य पाचन समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
समय पर लीकेज बंद नहीं होने पर स्थिति जानलेवा हो सकती है। परंपरागत रूप से गंभीर मामलों में सर्जरी कर पैंक्रियास का प्रभावित हिस्सा निकालना पड़ सकता है। इससे आगे चलकर इंसुलिन की कमी और मधुमेह होने के साथ भोजन पचाने के लिए एंजाइम की दवाएं लेने की आवश्यकता पड़ सकती है।
डा. बंसल के अनुसार, चुनिंदा मरीजों में ईआरसीपी (एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलैंजियोपैंक्रियाटोग्राफी) तकनीक से बिना बड़े आपरेशन के इलाज संभव है। इसमें एंडोस्कोपी के जरिए पैंक्रियास की नली तक पहुंचकर तार डाला जाता है और स्टेंट लगाया जाता है। इससे रिसाव को रोककर पैंक्रियाटिक जूस को दोबारा आंत तक पहुंचाने में मदद मिलती है। हालांकि, यह जटिल प्रक्रिया है और इसके लिए विशेष तकनीकी दक्षता जरूरी होती है।
एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस के मरीजों को चिकित्सकीय निगरानी में रहना चाहिए। लगातार बुखार, सांस लेने में परेशानी, पेट फूलना, दस्त या वजन तेजी से घटने पर तत्काल विशेषज्ञ से संपर्क करें। समय पर जांच, सही उपचार और नियमित फालोअप गंभीर जटिलताओं से बचाने में मदद कर सकते हैं। ईआरसीपी और स्टेंट का विकल्प हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होता। उपचार का निर्णय विशेषज्ञ जांच और बीमारी की स्थिति के आधार पर लिया जाता है।