
हेल्थ डेस्क। आज फिटनेस का मतलब अक्सर जिम, स्मार्टवॉच, स्टेप काउंटर और 10 हजार कदम के लक्ष्य से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन महात्मा गांधी की फिटनेस रूटीन इससे बिल्कुल अलग थी। उनकी जिंदगी में चलना-फिरना किसी अलग वर्कआउट का हिस्सा नहीं था, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की सामग्री के मुताबिक, गांधी जी करीब चार दशकों तक रोजाना लगभग 18 किलोमीटर पैदल चलते थे। 1913 से 1948 के बीच उनके राजनीतिक अभियानों और यात्राओं के दौरान उनके करीब 79 हजार किलोमीटर पैदल चलने का अनुमान लगाया गया है। यह दूरी पृथ्वी की परिधि के लगभग दो गुने के बराबर है।
हालांकि, गांधी जी की फिटनेस को सिर्फ इतनी लंबी दूरी से समझना सही नहीं होगा। उनके लिए स्वास्थ्य का मतलब नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित खान-पान, स्वच्छता, मानसिक स्वास्थ्य, आत्मसंयम और प्रकृति के साथ जुड़ाव से था।
गांधी जी की शारीरिक गतिविधियों में पैदल चलना सबसे प्रमुख था। ICMR की ‘Gandhi and Health @150’ सामग्री में उनके करीब चार दशकों तक रोजाना लगभग 18 किलोमीटर चलने का उल्लेख मिलता है।
खास बात यह थी कि उनके लिए पैदल चलना कोई ऐसा वर्कआउट नहीं था, जिसे दिन के किसी खास समय में अलग से करना पड़े। राजनीतिक यात्राओं, अभियानों और रोजमर्रा के कामों के दौरान भी उनका काफी समय चलते हुए बीतता था।
आज के समय में इस आदत से एक अहम बात सीखी जा सकती हैशरीर को एक्टिव रखने के लिए हर बार जिम जाना जरूरी नहीं है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, वयस्कों को हर सप्ताह कम से कम 150 से 300 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। तेज गति से चलना भी इस गतिविधि का हिस्सा हो सकता है। इसके साथ सप्ताह में कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली गतिविधियां करने की सलाह दी जाती है।
आज 10 हजार कदम रोज चलने का लक्ष्य काफी लोकप्रिय है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए यही संख्या जरूरी नहीं है। 2025 में The Lancet Public Health में प्रकाशित एक systematic review और dose-response meta-analysis में रोजाना कदमों की संख्या और स्वास्थ्य से जुड़े कई परिणामों के बीच संबंध का अध्ययन किया गया। इसमें कई स्वास्थ्य परिणामों के लिए करीब 5,000 से 7,000 कदम प्रतिदिन के आसपास स्पष्ट लाभ दिखाई दिए।
हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि यह observational evidence पर आधारित संबंध है। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी निश्चित संख्या में कदम चलना बीमारी को रोकने की गारंटी देता है। सीधी बात यह है कि लंबे समय तक बिल्कुल बैठे रहने की तुलना में नियमित रूप से शरीर को सक्रिय रखना ज्यादा फायदेमंद है।
इसलिए ऑफिस में घंटों बैठने वाले लोग गांधी जी की 18 किलोमीटर की दूरी को लक्ष्य बनाने के बजाय छोटी-छोटी आदतें अपना सकते हैं। जैसे पैदल छोटी दूरी तय करना, लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करना, लंबे समय तक बैठने के बीच छोटे movement breaks लेना और सुबह या शाम तेज चाल से टहलना।
गांधी जी की स्वास्थ्य संबंधी सोच केवल पैदल चलने तक सीमित नहीं थी। National Medical Journal of India में प्रकाशित ‘The Health File of Mahatma Gandhi’ में उनकी स्वास्थ्य संबंधी सोच और योग व प्राकृतिक चिकित्सा में रुचि का उल्लेख मिलता है।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1930 के दशक में उनका संबंध स्वामी कुवलयानंद से भी रहा, जो योग के वैज्ञानिक अध्ययन के शुरुआती प्रमुख नामों में गिने जाते हैं।
आज योग को सिर्फ शरीर को स्ट्रेच करने वाली एक्सरसाइज मानना सही नहीं होगा। योग की अलग-अलग विधियों में शारीरिक आसन के साथ सांस लेने की तकनीक, विश्राम और ध्यान भी शामिल हो सकते हैं।
आधुनिक शोध में भी योग के कई संभावित स्वास्थ्य लाभों का अध्ययन किया गया है। कुछ systematic reviews में उम्रदराज लोगों में योग को बेहतर संतुलन, लचीलेपन, ताकत और जीवन की गुणवत्ता से जोड़ा गया है। ब्लड प्रेशर को लेकर हुए अध्ययनों में भी योग से औसतन मामूली कमी देखी गई है, हालांकि अलग-अलग अध्ययनों के परिणाम और उनकी गुणवत्ता अलग रही है।
इसलिए योग को किसी बीमारी का इलाज मानने के बजाय शारीरिक गतिविधि, सांस और मानसिक एकाग्रता को जोड़ने वाली गतिविधि के तौर पर समझना ज्यादा सही है।
गांधी जी की फिटनेस रूटीन में सबसे खास बात शायद यह नहीं थी कि वह रोज कितने किलोमीटर चलते थे, बल्कि यह थी कि शारीरिक गतिविधि उनकी जिंदगी का लगातार हिस्सा थी।
ICMR के अनुसार, गांधी जी की स्वास्थ्य संबंधी सोच में शारीरिक फिटनेस के साथ संतुलित आहार, स्वच्छता और मानसिक स्वास्थ्य भी जुड़े हुए थे।
गांधी जी ने लिखा था, “It is health that is real wealth and not pieces of gold and silver.” यानी असली धन स्वास्थ्य है, सोना-चांदी नहीं।
आधुनिक विज्ञान भी नियमित शारीरिक गतिविधि को हृदय स्वास्थ्य, टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम और मानसिक स्वास्थ्य समेत कई पहलुओं से जोड़ता है। यही वजह है कि WHO नियमित शारीरिक गतिविधि पर जोर देता है, न कि कभी-कभार बहुत ज्यादा एक्सरसाइज करने पर।
यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है। गांधी जी रोज करीब 18 किलोमीटर चलते थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आज हर व्यक्ति को इतनी ही दूरी चलने की जरूरत है।
हर व्यक्ति की उम्र, फिटनेस, स्वास्थ्य, काम और शारीरिक क्षमता अलग होती है। इसलिए गांधी जी की व्यक्तिगत रूटीन को ज्यों का त्यों अपनाना सही तरीका नहीं है।
आज की जिंदगी में उनकी फिटनेस सोच को अपनाने का आसान तरीका है- कम बैठें, ज्यादा चलें और नियमित रूप से शरीर को सक्रिय रखें।
ऑफिस में लगातार कई घंटे बैठने के बजाय बीच-बीच में उठना, छोटी दूरी के लिए पैदल जाना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना, नियमित वॉक करना और अपनी क्षमता के अनुसार योग या strength exercise को रूटीन में शामिल करना ज्यादा व्यावहारिक है।
गांधी जी की फिटनेस रूटीन बेहद low-tech थी- पैदल चलना, शारीरिक काम, अनुशासित दिनचर्या और योग में रुचि। आज जब हमारी जिंदगी स्क्रीन, कार और लंबे समय तक बैठे रहने से घिर गई है, तब उनकी फिटनेस से मिलने वाला सबसे आसान संदेश शायद यही है- ज्यादा चलिए, नियमित चलिए और स्वास्थ्य को किसी एक दिन का लक्ष्य नहीं, बल्कि रोज की आदत बनाइए।
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