
लाइफस्टाइल डेस्क। मध्य प्रदेश की पहचान सिर्फ उसके ऐतिहासिक किलों और पर्यटन स्थलों से नहीं, बल्कि यहां की पारंपरिक साड़ियों से भी है। महेश्वरी और चंदेरी साड़ियां देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी खास पहचान रखती हैं। पहली नजर में दोनों साड़ियां हल्की, खूबसूरत और पारंपरिक डिजाइन वाली लग सकती हैं, लेकिन इनकी बुनाई, बनावट और पहचान में काफी अंतर है। एक की पहचान उसके खास बॉर्डर और ज्यामितीय डिजाइनों से होती है, तो दूसरी अपने बेहद हल्के कपड़े और पारदर्शी बनावट के लिए जानी जाती है।
महेश्वरी साड़ी का इतिहास मध्य प्रदेश के महेश्वर से जुड़ा है। माना जाता है कि 18वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई होलकर ने इस बुनाई परंपरा को बढ़ावा दिया था। उन्होंने बुनकरों को महेश्वर बुलाकर साड़ी और वस्त्र बनाने की कला को प्रोत्साहित किया।
इस साड़ी की सबसे खास पहचान इसका बॉर्डर होता है। इसमें मंदिर, नर्मदा लहर, ईंट और ज्यामितीय आकृतियों से प्रेरित डिजाइन देखने को मिलते हैं। इसकी बुनाई में सूती और रेशमी धागों का इस्तेमाल किया जाता है। कई महेश्वरी साड़ियों में शरीर का हिस्सा सूती और बॉर्डर या पल्लू रेशमी धागों से तैयार किया जाता है।
इसकी बनावट हल्की होती है और बॉर्डर पर रंगों का खूबसूरत मेल इसे अलग पहचान देता है।
चंदेरी साड़ी: हल्कापन और पारदर्शी बनावट
चंदेरी साड़ी का संबंध मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले के चंदेरी कस्बे से है। इसकी पहचान बेहद हल्के, महीन और हल्की चमक वाले कपड़े से होती है। पारंपरिक चंदेरी साड़ियों में रेशम और सूती धागों का इस्तेमाल किया जाता है। आजकल अलग-अलग तरह के धागों से भी इनकी बुनाई होती है।
चंदेरी साड़ी की खासियत उसका पारदर्शी टेक्सचर और बारीक डिजाइन हैं। इसमें अशर्फी बूटी, मोर, फूल और पारंपरिक आकृतियां बुनी जाती हैं। इसका पल्लू और बॉर्डर भी खास डिजाइन में तैयार किया जाता है। हल्की होने की वजह से इसे लंबे समय तक पहनना आसान होता है और यह शादी, त्योहारों व खास मौकों पर पसंद की जाती है।
\महेश्वरी और चंदेरी साड़ियों के बीच सबसे बड़ा अंतर उनकी बुनावट और लुक में दिखाई देता है।
दोनों साड़ियां मध्य प्रदेश की समृद्ध हथकरघा परंपरा का हिस्सा हैं। इनके पीछे सिर्फ कपड़ा बनाने की तकनीक नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा बुनकरों का हुनर और सांस्कृतिक विरासत भी है।