
लाइफस्टाइल डेस्क। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का पातालकोट नाम सुनते ही अक्सर एक ऐसी जगह की तस्वीर सामने आती है, जो मानो धरती के अंदर बसी हो। लेकिन पातालकोट वास्तव में जमीन के नीचे बना कोई गांव नहीं, बल्कि तामिया इलाके में ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से घिरी एक गहरी घाटी है। इसकी बनावट ऐसी है कि ऊपर से देखने पर यह धरती के भीतर बसी दुनिया जैसी नजर आती है।
करीब 79 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके में करीब 12 गांव और कई छोटी बस्तियां हैं। यहां मुख्य रूप से भरिया और गोंड समुदाय के लोग रहते हैं। इनमें भरिया समुदाय को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह यानी PVTG में शामिल किया गया है।
पातालकोट की पहचान सिर्फ इसकी बनावट नहीं है। यहां की जिंदगी पहाड़, जंगल, खेती, पानी और सीमित रोजगार के इर्द-गिर्द लंबे समय से चलती आई है। हालांकि सड़क, स्कूल, बिजली, मोबाइल और सरकारी योजनाओं के पहुंचने के साथ यहां की जिंदगी भी धीरे-धीरे बदल रही है।
पातालकोट के लोगों का जंगल से रिश्ता काफी पुराना है। खासकर भरिया समुदाय के बीच जंगल में मिलने वाले पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों और औषधीय वनस्पतियों का पारंपरिक ज्ञान महत्वपूर्ण रहा है। जंगल से मिलने वाली चीजें यहां सिर्फ आय का साधन नहीं रहीं। फल, वन उत्पाद और दूसरी प्राकृतिक चीजें भोजन और रोजमर्रा की जरूरतों में भी इस्तेमाल होती रही हैं।
महुआ, आंवला और दूसरे लघु वनोपज लोगों की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। हालांकि आज की जिंदगी पहले जैसी पूरी तरह जंगल पर निर्भर नहीं है। बाजार, सरकारी राशन और दूसरी आधुनिक सुविधाओं की पहुंच बढ़ने से लोगों की जरूरतें और जीवनशैली दोनों बदली हैं।
पातालकोट की अर्थव्यवस्था को मोटे तौर पर खेती, जंगल और मजदूरी से समझा जा सकता है। यहां खेती काफी हद तक बारिश पर निर्भर रहती है। मक्का, गेहूं, चना और विभिन्न दालें उगाई जाती हैं। लेकिन पानी की सीमित उपलब्धता के कारण हर जगह साल में कई फसलें लेना आसान नहीं है।
खेती से पर्याप्त आय न होने पर कुछ लोग मजदूरी के लिए आसपास के इलाकों या दूसरे जिलों में भी जाते हैं। खासकर पुरुषों के बाहर जाकर खेतों में काम करने के मामले सामने आते रहे हैं। इसलिए पातालकोट की जिंदगी को सिर्फ “जंगल पर निर्भर आत्मनिर्भर जीवन” कहना भी आज पूरी तस्वीर नहीं बताता। खेती के साथ मजदूरी और बाहर जाकर काम करना भी यहां की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।
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पातालकोट की जिंदगी की सबसे अहम चुनौतियों में पीने का पानी शामिल है। गहरी घाटी और पहाड़ी ढलानों की वजह से यहां पानी का प्राकृतिक बहाव तेज होता है। इससे जमीन के भीतर पानी का recharge प्रभावित होता है। गर्मियों में कई कुओं का पानी कम हो जाता है या वे सूख जाते हैं। ऐसे समय में झरने और दूसरे प्राकृतिक स्रोत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
कुछ बस्तियों में लोगों को आज भी घर से दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। यानी कई परिवारों के लिए पानी घर के नल से मिलने वाली सामान्य सुविधा नहीं, बल्कि रोज की मेहनत है।
2022 की एक ग्राउंड रिपोर्ट में पातालकोट के रातेड क्षेत्र के तालाब ढाना इलाके में रहने वाले करीब 100 परिवारों के पानी के संकट का जिक्र किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार कुछ परिवारों को करीब 1 से 2 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता था। यही वजह है कि यहां पानी की समस्या को समझे बिना पातालकोट की रोजमर्रा की जिंदगी को समझना मुश्किल है।
पातालकोट में बिजली पहुंच चुकी है। इसलिए यह कहना कि यहां बिजली बिल्कुल नहीं है, सही तस्वीर नहीं होगी। हालांकि बिजली की उपलब्धता और वोल्टेज को लेकर कुछ इलाकों में दिक्कतें सामने आती रही हैं। 2024 की एक ग्राउंड रिपोर्ट में स्थानीय लोगों ने बताया था कि कम वोल्टेज के कारण पानी की मोटर चलाने में परेशानी होती है।
कुछ संस्थानों में सोलर पैनल लगाए गए हैं, लेकिन उनके रखरखाव और बैटरी से जुड़ी समस्याएं भी सामने आई हैं।
यानी पातालकोट में आधुनिक सुविधाएं पहुंची जरूर हैं, लेकिन सुविधा का पहुंचना और उसका लगातार और भरोसेमंद तरीके से मिलना- दो अलग बातें हैं।
पातालकोट की भौगोलिक बनावट यहां की जिंदगी को एक और तरीके से प्रभावित करती है। चारों ओर ऊंची पहाड़ियों से घिरी घाटी के नीचे बसे इलाकों में सूरज की सीधी रोशनी मैदानी इलाकों की तुलना में कुछ समय कम मिल सकती है। खासकर सुबह और शाम पहाड़ियों की स्थिति के कारण घाटी के कुछ हिस्सों में धूप देर से पहुंचती या जल्दी चली जाती है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पातालकोट में पूरे दिन अंधेरा रहता है। किसी बस्ती को कितनी देर सीधी धूप मिलेगी, यह उसकी भौगोलिक स्थिति, मौसम और आसपास की पहाड़ियों पर निर्भर करता है।
प्रकृति प्रेमियों और वैज्ञानिकों के लिए पातालकोट किसी कूट आश्चर्य से कम नहीं है। चारों तरफ से आसमान छूती पहाड़ियों से घिरी इस घाटी में औषधीय पौधों, दुर्लभ जड़ी-बूटियों, जीव-जंतुओं और रंग-बिगे पक्षियों का एक विशाल संसार बसता है। आयुर्वेद और कूट चिकित्सा विज्ञान के जानकार इसे प्राकृतिक औषधियों का अनमोल खजाना मानते हैं।
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पातालकोट में बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों और आवासीय स्कूलों की व्यवस्था की गई है। सड़क और परिवहन सुविधाओं के विस्तार के साथ शिक्षा तक पहुंच पहले की तुलना में बढ़ी है। स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध हैं, लेकिन यहां की सबसे बड़ी चुनौती फिर वही भौगोलिक दूरी है।
किसी दूर की बस्ती से स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना सामान्य मैदानी इलाके की तरह आसान नहीं होता। 2024 की रिपोर्टों में स्थानीय लोगों की ओर से स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता को लेकर भी समस्याएं बताई गई थीं।
यदि आप पातालकोट की असीम सुंदरता को ऊपर से निहारना चाहते हैं, तो जुलाई से सितंबर तक का मानसून का मौसम सबसे परफेक्ट माना जाता है, जब चारों तरफ बादलों की कूट आवाजाही और धरती की सोंधी सुगंध मन मोह लेती है। वहीं, अगर आप ट्रैकिंग करते हुए घाटी के अंदरूनी हिस्सों और गांवों को करीब से देखना चाहते हैं, तो अक्टूबर से फरवरी के बीच का सुहाना विंटर सीजन सबसे मुफीद रहता है।
घाटी की गहराई में ठहरने के लिए कोई आधुनिक होटल या लग्जरी विन्यास उपलब्ध नहीं है। रोमांच के शौकीन पर्यटक यहाँ पहाड़ों पर टेंट (कैंपिंग) लगाकर रात गुजार सकते हैं। इसके अलावा, तामिया में स्थित सरकारी पीडब्ल्यूडी (PWD) गेस्ट हाउस में रुकने की विधिक व्यवस्था मिल जाती है।
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इस रहस्यमयी घाटी तक पहुंचने के लिए हवाई मार्ग से आने वाले पर्यटक भोपाल या जबलपुर एयरपोर्ट पर उतर सकते हैं, जहाँ से आगे के सफर के लिए सीधी टैक्सियां उपलब्ध रहती हैं। रेल मार्ग के जरिए सफर करने वाले यात्री भोपाल या जबलपुर से चलने वाली 'पातालकोट एक्सप्रेस' के माध्यम से सीधे छिंदवाड़ा रेलवे स्टेशन पहुंच सकते हैं।
सड़क मार्ग से यात्रा करने वालों के लिए यह क्षेत्र नागपुर से मात्र 125 किलोमीटर, जबलपुर से 215 किलोमीटर और राजधानी भोपाल से 286 किलोमीटर की विधिक दूरी पर स्थित है, जहाँ से नियमित अंतराल पर बसें और निजी वाहन संचालित होते हैं।