
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। शारदीय नवरात्र की आहट के साथ संस्कारधानी में दुर्गोत्सव का रंग अब गहराने लगा है। शहर की गलियों से लेकर प्रमुख मार्गों तक पंडालों की तैयारियां शुरू हो गई हैं और दूसरी ओर मूर्तिकारों की कार्यशालाओं में मिट्टी मां दुर्गा का स्वरूप ले रही है।
कहीं विशाल प्रतिमा का ढांचा तैयार हो रहा है तो कहीं चेहरे की भाव-भंगिमा को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सुबह की पहली किरण से लेकर देर रात तक मूर्तिकार और उनके सहयोगी मां की प्रतिमाओं को आकार देने में जुटे हैं। इस समय मिट्टी, रंग, लकड़ी और सजावटी सामान के बीच कलाकारों की व्यस्तता देखते ही बन रही है।
किसी प्रतिमा की आंखों को आकार दिया जा रहा है तो कहीं मुकुट और आभूषणों पर बारीक काम चल रहा है। एक ओर जहां पारंपरिक प्रतिमाओं की मांग बनी हुई है, वहीं इस बार कई समितियां आकर्षक और अलग स्वरूप वाली प्रतिमाएं तैयार करा रही हैं।
मूर्तिकारों के लिए प्रतिमा का चेहरा सबसे चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। आंखों की बनावट, भौंहों की आकृति, होंठों की संरचना और चेहरे के भाव को इस तरह तैयार किया जाता है कि प्रतिमा में जीवंतता नजर आए। मिट्टी की साधारण आकृति धीरे-धीरे कलाकार के हाथों से मां दुर्गा के भव्य स्वरूप में बदलती जाती है।
मूर्तिकार संतोष प्रजापति बताते हैं कि प्रतिमा बनाना केवल मिट्टी को आकार देने का काम नहीं, बल्कि इसमें भाव और कल्पना को भी उतारना पड़ता है। वे कहते हैं, मां के चेहरे और आंखों पर सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। श्रद्धालु जब प्रतिमा के सामने खड़े हों तो उन्हें चेहरे पर मां का तेज और ममता दोनों नजर आएं।
यही हमारी कोशिश रहती है। नवरात्र नजदीक आते ही काम कई गुना बढ़ जाता है और देर रात तक प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का सिलसिला चलता है।
इस बार प्रतिमाओं में पारंपरिक स्वरूप के साथ रंगों और सजावट में भी नए प्रयोग देखने मिल रहे हैं। लाल, पीले, गुलाबी और हरे रंगों के साथ सुनहरे रंग की सजावट प्रतिमाओं को आकर्षक बना रही है।
कहीं मां महिषासुर का वध करते हुए नजर आएंगी तो कहीं भव्य दरबार में विराजमान होंगी। कुछ समितियां मां काली के स्वरूप को भी विशेष आकर्षण के साथ तैयार करा रही हैं।
मूर्तिकार अमित प्रजापति कहते हैं, "हर साल समितियां कुछ नया चाहती हैं, लेकिन मां का पारंपरिक स्वरूप भी बना रहे, इसका विशेष ध्यान रखा जाता है।
इस बार अलग-अलग आकार और डिजाइन की प्रतिमाओं के ऑर्डर मिले हैं। प्रतिमा की ऊंचाई और डिजाइन के साथ पंडाल की थीम का भी ध्यान रखना पड़ता है। जब तैयार प्रतिमा पंडाल में पहुंचकर श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है, तब हमारी मेहनत सफल लगती है।"
जबलपुर की प्रतिमा कला की मांग अब केवल शहर और आसपास के क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। यहां तैयार होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमाएं मध्यप्रदेश के कई जिलों के अलावा उत्तरप्रदेश और छत्तीसगढ़ तक पहुंच रही हैं। सतना, रीवा, कटनी, नरसिंहपुर, गोटेगांव, करेली, सिवनी और शहडोल के अलावा रायपुर, दुर्ग, भिलाई, बांदा, अशोकनगर, गुना, मुंगावली और नर्मदापुरम तक यहां की प्रतिमाएं भेजी जाती हैं।
कई दुर्गोत्सव समितियां पहले ही प्रतिमाओं की बुकिंग करा चुकी हैं। प्रतिमाओं को ले जाने के लिए समितियों के सदस्य स्वयं वाहन लेकर कार्यशालाओं तक पहुंचते हैं। बड़ी प्रतिमाओं को कार्यशाला से बाहर निकालकर वाहन में सुरक्षित रखने के लिए कई लोगों की मदद ली जाती है। रास्ते में प्रतिमा को किसी तरह का नुकसान न हो, इसके लिए पैकिंग और परिवहन में भी विशेष सावधानी बरती जाती है।
जबलपुर में दुर्गा प्रतिमा निर्माण से कई परिवार पीढ़ियों से जुड़े हुए हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर लकड़ी और बांस का ढांचा बनाने, उस पर मिट्टी चढ़ाने, आकार देने, रंग भरने और आभूषण-सज्जा तक हर चरण में कलाकारों की मेहनत शामिल होती है। कोलकाता की पारंपरिक प्रतिमा कला के साथ जबलपुर ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है। यहां की प्रतिमाओं में पारंपरिक शिल्प, स्थानीय कलाकारों की कल्पनाशीलता और आधुनिक सज्जा का सुंदर मेल दिखाई देता है। यही वजह है कि नवरात्र नजदीक आते ही शहर की मूर्तिकार बस्तियों में काम की रफ्तार बढ़ जाती है।
प्रतिमाओं के साथ दुर्गोत्सव समितियां पंडालों की थीम और सजावट पर भी तेजी से काम कर रही हैं। कई स्थानों पर प्रतिमा के स्वरूप के अनुरूप ही पंडाल तैयार किए जा रहे हैं।
समितियों की कोशिश है कि इस बार श्रद्धालुओं को केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि एक अलग दृश्य अनुभव भी मिले। अब मूर्तिकारों के लिए आने वाले दिन सबसे व्यस्त रहने वाले हैं।
अधूरी प्रतिमाओं को अंतिम स्पर्श देना है, रंग भरने हैं, आभूषण सजाने हैं और मां के चेहरे पर वह भाव लाना है, जिसके सामने पहुंचकर श्रद्धालुओं की नजर ठहर जाए।
कार्यशालाओं में दिन-रात चल रही मेहनत का परिणाम जल्द ही शहर के पंडालों में दिखाई देगा। मिट्टी से आकार ले रहीं ये प्रतिमाएं केवल कला का नमूना नहीं, बल्कि कलाकारों की आस्था, हुनर और वर्षों की परंपरा का जीवंत रूप है