
लाइफस्टाइल डेस्क। किडनी हमारे शरीर का प्राकृतिक फिल्टर है, जो खून से हानिकारक पदार्थों और अतिरिक्त पानी को बाहर निकालती है। इसकी कार्यक्षमता जानने के लिए आमतौर पर क्रिएटिनिन की जांच की जाती है, लेकिन क्या क्रिएटिनिन सामान्य होने का मतलब किडनी पूरी तरह स्वस्थ है? जरूरी नहीं। इसलिए किडनी की जांच में अब ईजीएफआर (एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट) को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्रिएटिनिन मांसपेशियों में बनने वाला अपशिष्ट पदार्थ है, जिसे किडनी शरीर से बाहर निकालती है। किडनी की कार्यक्षमता घटने पर खून में इसका स्तर बढ़ सकता है। हालांकि उम्र, लिंग और मांसपेशियों की बनावट भी क्रिएटिनिन को प्रभावित करती है। ऐसे में केवल इस जांच से किडनी की स्थिति का सही आकलन हमेशा संभव नहीं होता।
ईजीएफआर किडनी की खून छानने की क्षमता का अनुमान बताता है। इसकी गणना मुख्य रूप से क्रिएटिनिन, उम्र और लिंग के आधार पर की जाती है। उदाहरण के लिए, 25 वर्ष के युवक और 70 वर्ष के बुजुर्ग का क्रिएटिनिन यदि 1.2 है, तो भी उनकी किडनी की कार्यक्षमता समान नहीं होगी।
बुजुर्ग का ईजीएफआर अपेक्षाकृत कम हो सकता है। सामान्यतः ईजीएफआर 90 या इससे अधिक बेहतर माना जाता है। यदि यह 60 से कम लगातार तीन महीने तक बना रहे, तो क्रानिक किडनी डिजीज का संकेत हो सकता है। वहीं 30 से कम स्तर गंभीर कमी दर्शाता है।
हालांकि कम ईजीएफआर का अर्थ तुरंत डायलिसिस की जरूरत होना नहीं है। डाॅ. ईशा तिवारी अरोरा, किडनी रोग विशेषज्ञ के अनुसार डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और किडनी रोग के जोखिम वाले लोगों को क्रिएटिनिन के साथ ईजीएफआर और पेशाब में एल्ब्यूमिन की जांच भी करानी चाहिए। किडनी की सेहत का सही आकलन करने के लिए केवल क्रिएटिनिन नहीं, बल्कि ईजीएफआर और अन्य जांचों को भी महत्व देना जरूरी है।