
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। तेज आवाज, बढ़ता ध्वनि प्रदूषण और उम्र के साथ सुनने की क्षमता में गिरावट लोगों को बहरेपन की ओर धकेल रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, देश में करीब 20 प्रतिशत लोग कम सुनने या बहरेपन से प्रभावित हैं। बुजुर्गों में यह अनुपात करीब 60 प्रतिशत है, जबकि 1000 में एक बच्चा इस समस्या से प्रभावित है। समय पर जांच और उपचार के साथ तेज आवाज से बचाव इस चुनौती से निपटने में मददगार हो सकता है।
शुक्रवार को कैंसर हास्पिटल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, ग्वालियर में न्यूरो-ओटोलाजिकल एंड इक्विलिब्रिमेट्रिक सोसाइटी आफ इंडिया का 44वां राष्ट्रीय सम्मेलन नेस्कान-2026 शुरू हुआ। इसमें विशेषज्ञों ने सुनने की समस्याओं और आधुनिक सर्जरी तकनीकों पर चर्चा की। उन्होंने ध्वनि प्रदूषण से बचाव, नियमित श्रवण जांच और शुरुआती उपचार पर जोर दिया।

भोपाल के ईएनटी विशेषज्ञ डाॅ. एसपी दुबे ने कहा कि पटाखों के धमाके, तेज आवाज वाले उपकरण और लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से कानों को नुकसान हो सकता है। सुनने की क्षमता में कमी के शुरुआती संकेतों को पहचानना जरूरी है। देशभर में करीब 20 प्रतिशत लोग कम सुनने या बहरेपन से प्रभावित हैं।
एम्स दिल्ली के डाॅ. कपिल सिक्का ने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ सुनने की क्षमता कम हो सकती है, लेकिन इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर पहचान से उपचार, श्रवण यंत्र या अन्य विकल्प अपनाए जा सकते हैं। बुजुर्गों में बहरेपन की समस्या अधिक देखने को मिलती है। इस आयु वर्ग में 10 में छह की सुनने की क्षमता प्रभावित है।
बेंगलुरु के डाॅ. संपत चंद्र प्रसाद राव ने बताया कि खोपड़ी के आधार में होने वाले पैरागैग्लियोमा ट्यूमर की सर्जरी पहले ओपन तकनीक से होती थी, जबकि अब एंडोस्कोपी और माइक्रोस्कोप का भी उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सर्जरी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल शुरू हो चुका है और भविष्य में इसकी भूमिका बढ़ सकती है।