
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में बाजार में उपलब्ध चमकदार पैकेटों में बंद भोजन हमारी सेहत के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। भारत का पैकेज्ड फूड बाजार 137.25 अरब डॉलर (लगभग 11.87 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच चुका है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हम जो खा रहे हैं, क्या वास्तव में उसका सच जानते हैं? खासकर तब, जब देश के 4 करोड़ से अधिक मोटे और अत्यधिक वजन (ओवरवेट) वाले बच्चों को भ्रामक विज्ञापनों के जरिए निशाना बनाया जा रहा है।
हाल ही में पैकेज्ड फूड पर 'फ्रंट-ऑफ-पैक' (Front-of-Pack) चेतावनी लेबल लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से सवाल किया कि बच्चों में बढ़ते मोटापे और जंक फूड की लत के बावजूद चेतावनी लेबल लागू करने में इतनी ढिलाई क्यों बरती जा रही है?
कोर्ट ने सरकार को यह भी चेताया कि नागरिकों का स्वास्थ्य सर्वोपरि है। यह नीति बड़ी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट्स के दबाव के कारण अटकी हुई है? अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि यदि सरकार जल्द नियम तय नहीं करती, तो कोर्ट स्वयं आदेश पारित करेगा।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार, भारत में कुल बीमारियों के बोझ का 56.4% हिस्सा अस्वास्थ्यकर आहार और खराब जीवनशैली से जुड़ा है। पैकेटबंद 'अल्ट्रा-प्रोसेस्ड' भोजन के अत्यधिक सेवन से हृदय रोगों के जोखिम में 10% की वृद्धि हो जाती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, पैकेटबंद भोजन सीधे तौर पर टाइप-2 डायबिटीज, मोटापा और मानसिक विकारों को ट्रिगर कर रहा है।
जो भोजन कभी सीधे खेतों से रसोई तक पहुंचता था, वह अब फैक्ट्रियों में आर्टिफिशियल रंगों, प्रिजर्वेटिव्स और स्टेबलाइजर्स के मेल से तैयार होने वाला उत्पाद बन चुका है। 'पारंपरिक' लिख देने भर से कोई पैकेज्ड उत्पाद सेहतमंद नहीं हो जाता। घर में बने ताजा खाने और महीनों तक केमिकल के सहारे सुरक्षित रखे गए प्रोसेस्ड फूड में जमीन-आसमान का अंतर है। अति-प्रसंस्कृत (Ultra-processed) भोजन में मिलाए गए स्वाद पेट भरने के बाद भी खाने की लत बनाए रखते हैं। हमें अपने और अपने बच्चों के स्वाद को प्राकृतिक मिठास (जैसे ताजे फल, सब्जियों) की ओर मोड़ना होगा।
फास्ट फूड और जंक फूड के बजाय हमारी पारंपरिक भारतीय रसोई में पोषण से भरपूर ढेरों विकल्प मौजूद हैं:
यह भी पढ़ें- कोरोना काल के बाद युवाओं में बढ़ा हार्ट अटैक, 40 से पहले ढाई गुना बढ़ा खतरा, आंबेडकर अस्पताल का अध्ययन