
लाइफस्टाइल डेस्क। काम पर घंटों बिताना एक बात है, लेकिन सिर्फ़ डेडलाइन पूरी करने के लिए एक ही डेस्क पर अनगिनत घंटे बिताना एक ऐसी आदत है जो न सिर्फ़ मेंटल हेल्थ पर बल्कि फिजिकल हेल्थ पर भी बुरा असर डालती है। स्पाइन की बढ़ती प्रॉब्लम चिंता की बात है। जो कभी बुज़ुर्गों की प्रॉब्लम थी अब कम उम्र के लोगों को भी हो रही है। हालांकि, उम्र की वजह से, कई लोग स्पाइन की प्रॉब्लम को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन वे चुपचाप बिगड़ती रहती हैं। ऐसे में, जल्दी और रेगुलर हेल्थ चेकअप से दर्द, अकड़न और लंबे समय तक चलने वाली डिसेबिलिटी को रोकने में मदद मिल सकती है। अब स्पाइन की हेल्थ पर ध्यान देने और ज़िंदगी की क्वालिटी सुधारने का समय है।
आजकल बहुत से लोग स्पाइन की प्रॉब्लम से जूझ रहे हैं। लंबे समय तक काम करने, खराब पोस्चर, बहुत ज़्यादा स्क्रीन टाइम और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण, स्पाइन से जुड़ी प्रॉब्लम मन की शांति छीन सकती हैं। स्पाइन की समस्याएं ऐसी स्थितियां हैं जो पीठ और गर्दन की हड्डियों, डिस्क, नसों या मांसपेशियों पर असर डालती हैं। इनमें मांसपेशियों में खिंचाव, स्लिप्ड या हर्नियेटेड डिस्क, सर्वाइकल या लंबर स्पोंडिलोसिस, और स्कोलियोसिस जैसी रीढ़ की हड्डी की खराबी जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं जो रोज़ाना के कामों में रुकावट डाल सकती हैं।
पीठ या गर्दन में दर्द, अकड़न, हाथों या पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन, लचीलेपन में कमी, और लंबे समय तक खड़े रहने या बैठने में दिक्कत जैसे लक्षणों के लिए मदद लेना ज़रूरी है। ज़्यादा गंभीर मामलों में, इससे मरीज़ों में कमज़ोरी या नसों में दबाव भी आ सकता है। समय पर जानकारी और रेगुलर जांच से चलने-फिरने में दिक्कत, दर्द, नसों को नुकसान, और पोस्चर की समस्याओं जैसी दिक्कतों को रोकने में मदद मिल सकती है। अगर इलाज न किया जाए, तो स्पाइन की समस्याएं ज़िंदगी की क्वालिटी पर असर डाल सकती हैं।
देश में एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में करीब 2-3 प्रतिशत स्पाइन सर्जरी एंडोस्कोपिक तकनीक से की जा रही हैं। आने वाले पांच वर्षों में यह आंकड़ा 25-30 प्रतिशत और अगले दस वर्षों में करीब 60 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह बात तमिलनाडु के एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जन डॉ. पलानी कुमार ने एंडोस्पाइनकान 2026 के दूसरे दिन कही।
