
लाइफस्टाइल डेस्क। भारतीय इतिहास में वीरांगनाओं की परंपरा केवल युद्धभूमि में शौर्य और कौशल दिखाने तक सीमित नहीं रही। मातृशक्ति ने परिवार, समाज और राष्ट्र की रक्षा के साथ-साथ कुशल शासन, सुदृढ़ अर्थव्यवस्था और लोककल्याण की जिम्मेदारियां भी सफलतापूर्वक संभाली हैं। इसी गौरवशाली परंपरा की उज्ज्वल प्रतिनिधि हैं गोंडवाना की महारानी रानी दुर्गावती।
5 अक्टूबर 1524 को दुर्गाष्टमी के दिन कालिंजर के चंदेल राजा कीरत सिंह के घर जन्मीं रानी दुर्गावती ने आगे चलकर जिस अदम्य साहस, स्वाभिमान और प्रशासनिक दूरदृष्टि का परिचय दिया, वह आज भी इतिहास के पन्नों से निकलकर वर्तमान भारत को दिशा दिखाता है। उनकी 503वीं जयंती के अवसर पर उन्हें स्मरण करना केवल अतीत को नमन करना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और जल संरक्षण जैसे आज के ज्वलंत प्रश्नों पर इतिहास से प्रेरणा लेना भी है।
गोंडवाना के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से विवाह के बाद रानी दुर्गावती गढ़-कटंगा (गोंडवाना) की राजपरंपरा का हिस्सा बनीं। पति के असमय निधन के बाद उन्होंने अपने अल्पायु पुत्र वीर नारायण के संरक्षक के रूप में शासन की बागडोर संभाली। उनके लगभग 16 सालों के शासनकाल को गोंडवाना के उत्कर्ष का काल माना जाता है।
रानी दुर्गावती ने स्थानीय संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल दिया। कृषि और वनोपज के साथ-साथ चिरौंजी, महुआ, लाख, शहद, गोंद, औषधीय वनस्पतियों तथा इमारती लकड़ी को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा गया।
वस्त्र निर्माण, काष्ठ उद्योग और कुटीर उद्योगों को भारी प्रोत्साहन मिला। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए लाख के आभूषणों जैसे लघु एवं गृह उद्योगों को बढ़ावा दिया गया।
अबुल फजल की 'आइन-ए-अकबरी' में गढ़-कटंगा की समृद्धि और सुव्यवस्थित कर प्रणाली (जैसे 'भाग' नामक कर) का उल्लेख मिलता है। यह प्रशासनिक केंद्रीकरण, कर संग्रह में एकरूपता और आर्थिक संसाधनों के कुशल प्रबंधन को दर्शाता है।
साल 1564 में मुगल सेनापति आसफ खान के आक्रमण का सामना करते हुए रानी दुर्गावती ने रणभूमि में स्वाभिमान की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की। उनका जीवन यह सिखाता है कि किसी राज्य की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सेना में नहीं, बल्कि उसकी कृषि, जल प्रबंधन, स्थानीय उद्योगों, सुव्यवस्थित राजस्व और जनता के आत्मविश्वास में निहित होती है।
आज जब भारत 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, तब रानी दुर्गावती का जीवन-दर्शन हमें सिखाता है कि विकास का वास्तविक आधार- स्थानीय संसाधनों का संतुलित उपयोग, प्रकृति का संरक्षण, जल स्रोतों का पुनर्जीवन और जन-भागीदारी होना चाहिए।
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