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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कई लोग रात में सोते समय ईयरफोन या ईयरबड्स लगाकर म्यूजिक, मेडिटेशन, पॉडकास्ट या व्हाइट नॉइज सुनते हैं। कुछ लोग आसपास के शोर, खर्राटों या दिमाग में चल रहे विचारों से बचने के लिए भी ऐसा करते हैं। हालांकि यह आदत आरामदायक लग सकती है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना कानों की सेहत के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है।
स्पेशलिस्ट के मुताबिक, अगर सही सावधानी नहीं बरती जाए तो इससे कान में इन्फेक्शन, वैक्स जमा होने और सुनने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
क्यों बढ़ जाता है इन्फेक्शन का खतरा?
हमारे कानों में सामान्य रूप से हवा का फ्लो बना रहता है। लेकिन लंबे समय तक ईयरबड्स लगाने से कान की नली बंद हो जाती है, जिससे नमी जमा होने लगती है। यह नमी बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए सबसे अच्छा इनवॉयरमेंट बना सकती है। जिन लोगों की स्किन सेंसिटिव है या पहले से कान की कोई समस्या है, उनमें इन्फेक्शन का खतरा अधिक हो सकता है। इन्फेक्शन होने पर कान में दर्द, खुजली या जलन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
ईयरफोन से कान का मैल भी हो सकता है जमा
स्पेशलिस्ट के अनुसार, लगातार ईयरबड्स लगाने से कान का वैक्स अंदर की ओर धकेला जा सकता है। अगर सुनने में दिक्कत, कान बंद होने का एहसास या भारीपन महसूस हो तो खुद कान साफ करने की बजाय ENT स्पेशलिस्ट से जांच करानी चाहिए।
तेज आवाज में सुनना पड़ सकता है भारी
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के अनुसार, सामान्य बातचीत की आवाज लगभग 60 से 70 डेसिबल होती है, जिसे सुरक्षित माना जाता है। वहीं 80 डेसिबल या उससे अधिक आवाज लंबे समय तक सुनने से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसलिए सोते समय भी कम आवाज में ही ऑडियो सुनना चाहिए।
अगर ईयरफोन लगाकर ही सोते हैं तो इन बातों का रखें ध्यान
बेहतर ऑप्शन क्या हैं?
स्पेशलिस्ट के अनुसार, इन-ईयर ईयरबड्स की जगह ओवर-द-ईयर हेडफोन, इन-बिल्ट स्पीकर वाले स्लीप हेडबैंड या तकिए के अंदर रखे जाने वाले फ्लैट स्पीकर बेहतर ऑप्शन हो सकते हैं। इनमें हवा का फ्लो बेहतर रहता है और इन्फेक्शन का खतरा कम होता है।
अगर आप नॉइज कैंसिलेशन का इस्तेमाल करते हैं, तो ध्यान रखें कि अलार्म या किसी इमरजेंसी स्थिति की आवाज सुनाई देना भी जरूरी है।