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पर्यावरण संरक्षण का संदेश देतीं बप्पा की अनूठी प्रतिमाएं, इंदौर में बनी श्रीगणेश की प्रतिमा की शहर के बाहर भी भारी मांग

इस साल बांस, सुतली, मिट्टी और रंगों के दामों में बढ़ोतरी से मूर्तियों की उत्पादन लागत पर असर पड़ा है। बावजूद इसके, मिट्टी से निर्मित पर्यावरण-अनुकूल म...और पढ़ें

By Rajneesh soniEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Sat, 12 Sep 2026 11:16:47 AM (IST)Updated Date: Sat, 12 Sep 2026 11:21:10 AM (IST)
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देतीं बप्पा की अनूठी प्रतिमाएं, इंदौर में बनी श्रीगणेश की प्रतिमा की शहर के बाहर भी भारी मांग
इंदौर में हो रहा भव्‍य गणेश मूर्तियों का निर्माण।

HighLights

  1. इंदौर के मूर्तिकारों द्वारा तैयार की जा रहीं इन प्रतिमाओं का डंका प्रदेश के बाहर भी बज रहा है।
  2. राजस्थान , गुजरात जोधपुर, जयपुर, उदयपुर, सूरत और अहमदाबाद से विशेष ऑर्डर मिले हैं।
  3. बाल स्वरूप, तांडव स्वरूप, जगन्नाथ स्वरूप और पारंपरिक चिंतामन गणेश स्वरूप की मांग है।

रजनीश सोनी -गणेशोत्सव को अब बस कुछ दिन शेष है, शहर के मूर्तिकला कारखानों में दिन-रात काम चल रहा है। इस बार पंडालों में विराजने के लिए तैयार हो रही प्रतिमाएं न केवल अपनी भव्यता, बल्कि गहरे सामाजिक और पर्यावरणीय संदेशों के चलते आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

प्रकृति और हरियाली की थीम पर गढ़ी 5 क्विंटल की विशेष प्रतिमा

  • बंगाली चौराहा क्षेत्र में तैयार की गई एक विशेष प्रतिमा इस बार पर्यावरण संरक्षण और हरियाली का सीधा संदेश दे रही है।
  • लगभग 5 क्विंटल वजनी और 70 हजार रुपये लागत वाली इस प्रतिमा को बेहद सधे हुए शिल्प में ढाला गया है।
  • प्रतिमा में विघ्नहर्ता के मुकुट को हरे-भरे पत्तों, घनी शाखाओं और परिंदों के घोंसलों से सजाया गया है।
  • कान विशालकाय हरी पत्तियों के आकार में गढ़े गए हैं, जिन पर पेड़ों की टहनियां, पत्ते खिलते दिख रहे हैं।
  • बप्पा के शरीर पर गिलहरी, पक्षी और प्राकृतिक लताओं का सुंदर अंकन यह बताता है कि प्रकृति और वन्यजीवन के बीच ही जीवन का संतुलन टिका है।

13 फीट के चिंतामन गणेश की भव्यता, कीमत 60 हजार रुपये

वहीं दूसरी ओर 13 फीट ऊंची ''''चिंतामन गणेश'''' स्वरूप की प्रतिमा भी बनकर लगभग तैयार है। 60 हजार रुपये की लागत वाली यह विशाल प्रतिमा पारंपरिक भव्यता और कला का बेहतरीन नमूना है।

सफेद और सुनहरे परिधान, बहुभुज मुद्रा और पीछे गहरे काले व सुनहरे रंग की नक्काशीदार भव्य पीठिका इसे राजसी स्वरूप प्रदान करती है। इस तरह के बड़े और दिव्य स्वरूपों की मांग इंदौर शहर के प्रमुख सार्वजनिक पंडालों के साथ-साथ सीमावर्ती राज्यों के बड़े आयोजकों द्वारा की जा रही है।


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कच्चे माल की महंगाई के बावजूद बढ़ा मूर्तियों का क्रेज

इस साल बांस, सुतली, मिट्टी और रंगों के दामों में बढ़ोतरी से मूर्तियों की उत्पादन लागत पर असर पड़ा है। बावजूद इसके, मिट्टी से निर्मित पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों की मांग में कोई कमी नहीं आई है। कारीगर बताते हैं कि गंगा और शिप्रा की पीली मिट्टी से इन मूर्तियों को ठोस आकार दिया जाता है, जिससे विसर्जन के समय जल स्रोतों को कोई नुकसान न पहुंचे।

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दूसरे राज्यों में पहुंच रही इंदौर की कला

इंदौर के मूर्तिकारों द्वारा तैयार की जा रहीं इन प्रतिमाओं का डंका प्रदेश के बाहर भी बज रहा है। राजस्थान , गुजरात जोधपुर, जयपुर, उदयपुर, सूरत और अहमदाबाद जैसे शहरों से 10 से 15 फीट ऊंची प्रतिमाओं के विशेष ऑर्डर मिले हैं।

विविध स्वरूप पर्यावरण थीम के अलावा इस बार बाल स्वरूप, तांडव स्वरूप, जगन्नाथ स्वरूप और पारंपरिक चिंतामन गणेश स्वरूप की मांग सर्वाधिक बनी हुई है।

कारखानों में अब अंतिम फिनिशिंग, रंगाई और वस्त्र सज्जा का काम पूरा किया जा रहा है, ताकि समय रहते इन्हें आयोजन स्थलों तक रवाना किया जा सके।