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पंचकूला स्‍कूल की घटना की जड़ों में आखिर क्‍या वजह है? छोटी बात पर बड़ा अपराध, बच्चों के व्यवहार में क्यों आ रहा इतना बदलाव

टीवी, मोबाइल गेम्स और इंटरनेट पर उपलब्ध हिंसक सामग्री बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। कम उम्र में बच्चे कई बार पर्दे पर दिखाई जाने वाली घटनाओं और वास्तविक जीवन के बीच अंतर नहीं समझ पाते। मारपीट, बदला लेने और आक्रामक व्यवहार को मनोरंजन के रूप में देखने से कुछ बच्चों में ऐसी प्रतिक्रियाएं सामान्य लगने लगती हैं।

By Navodit SaktawatEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Wed, 04 Nov 2026 04:43:27 PM (IST)Updated Date: Wed, 04 Nov 2026 05:01:52 PM (IST)
पंचकूला स्‍कूल की घटना की जड़ों में आखिर क्‍या वजह है? छोटी बात पर बड़ा अपराध, बच्चों के व्यवहार में क्यों आ रहा इतना बदलाव
बच्‍चों में बढ़ रहा है आक्रोश। एआई इमेज।

HighLights

  1. बच्चे का बार-बार मारपीट करना, छोटी बात पर आपा खो देना हिंसा है।
  2. दूसरों को चोट पहुंचाने की धमकी देना, जानवरों के प्रति क्रूरता करना।
  3. गलती पर पछतावा नहीं दिखाना को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

लाइफस्‍टाइल डेस्‍क। बचपन में गुस्सा, नाराजगी और आपसी झगड़े होना सामान्य है, लेकिन जब छोटी-सी बात पर बच्चा हिंसा पर उतर आए तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। हाल ही में सामने आई कुछ घटनाओं ने बच्चों के बदलते व्यवहार पर सवाल खड़े किए हैं। चाकलेट को लेकर डांटने पर 12 वर्षीय बच्ची द्वारा चार साल के बच्चे को पानी की टंकी में धकेलने का मामला हो या पंचकूला में आठ वर्षीय छात्र द्वारा छह साल की बच्ची पर ईंट से हमला करने की घटना। ये घटनाएं बताती हैं कि कम उम्र में भी गुस्सा किस हद तक हिंसक रूप ले सकता है।

स्क्रीन पर हिंसा का असर

टीवी, मोबाइल गेम्स और इंटरनेट पर उपलब्ध हिंसक सामग्री बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। कम उम्र में बच्चे कई बार पर्दे पर दिखाई जाने वाली घटनाओं और वास्तविक जीवन के बीच अंतर नहीं समझ पाते। मारपीट, बदला लेने और आक्रामक व्यवहार को मनोरंजन के रूप में देखने से कुछ बच्चों में ऐसी प्रतिक्रियाएं सामान्य लगने लगती हैं।


भावनाओं को समझने और व्यक्त करने में कठिनाई

बच्चों में गुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन हर बच्चा अपनी भावनाओं को समझना और व्यक्त करना नहीं जानता। जब उसे अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता या उसकी भावनाओं को बार-बार नजरअंदाज किया जाता है तो वह चिड़चिड़ा और आक्रामक हो सकता है। परिवार में लगातार झगड़े, डांट-फटकार, मारपीट और भावनात्मक उपेक्षा भी बच्चों के व्यवहार पर असर डाल सकती है।

अकेलापन और प्रतिस्पर्धा भी कारण

बच्चों पर पढ़ाई, अच्छे अंक लाने और हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव भी बढ़ रहा है। वहीं स्कूल में बुलिंग, दोस्तों से तुलना, अस्वीकार किए जाने और साथियों के दबाव जैसी स्थितियां उनके मन में तनाव पैदा कर सकती हैं। यदि बच्चा अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं कर पाता तो यह गुस्से और आक्रामकता के रूप में सामने आ सकती है।

समय रहते पहचानना जरूरी

बच्चे का बार-बार मारपीट करना, छोटी बात पर आपा खो देना, दूसरों को चोट पहुंचाने की धमकी देना, जानवरों के प्रति क्रूर व्यवहार करना या अपनी गलती पर पछतावा नहीं दिखाना जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि, किसी एक घटना के आधार पर बच्चे को मानसिक रूप से बीमार नहीं माना जा सकता। व्यवहार में लगातार बदलाव दिखने पर बाल मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक की सलाह लेना जरूरी है।

बच्चे को पर्याप्त समय दें

बच्चों को केवल डांटकर या सजा देकर उनके व्यवहार में बदलाव नहीं लाया जा सकता। माता-पिता को उनके साथ समय बिताना, उनकी बातें सुनना और गुस्से को सही तरीके से व्यक्त करना सिखाना होगा। स्कूलों में भी बुलिंग रोकने और भावनात्मक व्यवहार से जुड़ी शिक्षा पर ध्यान देना जरूरी है। बचपन में मिलने वाला सही मार्गदर्शन ही बच्चों को संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने में मदद कर सकता है।

बच्चों में बढ़ती हिंसा की बड़ी वजह भावनारहित अनावृत्ति (एक्सपोज़र विटाउट इमोशन) है। मोबाइल, टीवी पर हिंसक घटनाओं को देखकर बच्चे वैसा ही कर रहे हैं, वे इससे होने वाले नुकसान से अनजान हैं। युवाओं की सहनशीलता भी कम हो गई है, छोटी-छोटी बातों पर वे हिंसक हो रहे हैं। - डा. उज्जवल सरदेसाई, मनोचिकित्सक

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