
लाइफस्टाइल डेस्क। कभी ऐसा हुआ है कि आपने भरपेट खाना खाया, लेकिन मिठाई सामने आते ही मन फिर से खाने के लिए तैयार हो गया? या फिर पेट भरा होने के बावजूद चिप्स का पैकेट खत्म किए बिना चैन नहीं मिला? ऐसा सिर्फ आपके साथ नहीं होता। कई बार शरीर को और भोजन की जरूरत नहीं होती, लेकिन खाने की इच्छा बनी रहती है।
इसके पीछे केवल भूख नहीं, बल्कि दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम, खाने का स्वाद, भावनाएं और हमारी आदतें भी काम करती हैं। यानी पेट भरने के बाद भी खाने का मन करना हमेशा इस बात का संकेत नहीं है कि शरीर को और कैलोरी चाहिए।
जब हम खाना खाते हैं, तो पेट में फैलाव और पाचन तंत्र से मिलने वाले संकेत दिमाग तक पहुंचते हैं। GLP-1 और CCK जैसे हार्मोन भी भोजन के बाद पेट भरा महसूस कराने और खाने की इच्छा को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं।
लेकिन भूख और खाने की इच्छा को सिर्फ पेट के संकेत तय नहीं करते। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के Endotext में प्रकाशित समीक्षा के मुताबिक, भोजन का सेवन शरीर की ऊर्जा संबंधी जरूरतों के साथ-साथ स्वाद, भावनाओं, सामाजिक परिस्थितियों और खाने से मिलने वाले आनंद से भी प्रभावित होता है।
इसीलिए पेट भरने के बाद भी सामने रखी पसंदीदा डिश खाने का मन कर सकता है। शरीर को भोजन की जरूरत भले न हो, लेकिन दिमाग को उसका स्वाद आकर्षित कर सकता है।
खाने से सिर्फ भूख शांत नहीं होती, बल्कि आनंद भी मिलता है। खासकर मीठे, नमकीन या ज्यादा स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ खाने पर दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम सक्रिय हो सकता है। डोपामिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर इस प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं और किसी सुखद अनुभव को दोबारा पाने की प्रेरणा से जुड़े होते हैं।
हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के अनुसार, बहुत स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों को देखकर, सूंघकर या खाकर उनकी क्रेविंग बढ़ सकती है। खाने के विज्ञापन, उसकी खुशबू और आसपास दूसरे लोगों को खाते देखना भी इच्छा को बढ़ा सकता है।
यही वजह है कि खाने के बाद भी आइसक्रीम, चॉकलेट या पसंदीदा स्नैक्स के लिए मन मचल सकता है। इसे हमेशा शारीरिक भूख समझना सही नहीं होगा।
कई लोग तनाव, उदासी, अकेलेपन या बोरियत के दौरान कुछ न कुछ खाने लगते हैं। इसे भावनात्मक भोजन यानी इमोशनल ईटिंग कहा जाता है। ऐसे समय में खाना कुछ देर के लिए अच्छा महसूस करा सकता है या ध्यान दूसरी ओर लगा सकता है।
हार्वर्ड की Nutrition Source गाइड में शारीरिक भूख और भावनात्मक भूख के बीच कुछ अंतर बताए गए हैं। शारीरिक भूख आम तौर पर धीरे-धीरे बढ़ती है, जबकि भावनात्मक भूख अचानक उठ सकती है और किसी खास चीज- जैसे चॉकलेट, पिज्जा या चिप्स- की इच्छा पैदा कर सकती है। हालांकि, ये संकेत हर व्यक्ति में एक जैसे नहीं होते।
अगर कोई व्यक्ति बार-बार तनाव से निपटने के लिए खाना खाने लगता है, तो यह आदत बन सकती है। ऐसे में यह पहचानना उपयोगी है कि खाने की इच्छा वास्तव में भूख से आ रही है या किसी भावना से।
2019 में Cell Metabolism जर्नल में प्रकाशित अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के एक नियंत्रित अध्ययन में 20 वयस्कों को दो तरह के आहार दिए गए- अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और कम प्रोसेस्ड। प्रतिभागियों ने अल्ट्रा-प्रोसेस्ड आहार के दौरान औसतन करीब 508 कैलोरी प्रतिदिन ज्यादा खाईं। इस दौरान उनका वजन भी बढ़ा, जबकि कम प्रोसेस्ड आहार के दौरान वजन घटा।
यह एक छोटा अध्ययन था, इसलिए इसके नतीजों को हर व्यक्ति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। साथ ही, इससे यह तय नहीं होता कि ज्यादा खाने की वजह केवल स्वाद था। हालांकि, अध्ययन दिखाता है कि भोजन का प्रकार भी इस बात को प्रभावित कर सकता है कि हम कितना खाते हैं।
सबसे पहले खुद से पूछें कि क्या सच में भूख लगी है या सिर्फ कुछ स्वादिष्ट खाने का मन है। खाना खाते समय धीरे-धीरे खाएं और बीच-बीच में ध्यान दें कि पेट कितना भरा महसूस हो रहा है। टीवी या मोबाइल देखते हुए खाने से भी इस बात पर ध्यान कम हो सकता है कि कितना खाया जा चुका है।
अगर पेट भर चुका है, तो कुछ देर रुककर देखें कि खाने की इच्छा बनी रहती है या कम हो जाती है। भोजन में प्रोटीन, फाइबर और दूसरे पोषक तत्वों के अच्छे स्रोत शामिल करना भी संतुष्टि बनाए रखने में मदद कर सकता है।
कभी-कभार ज्यादा खा लेना सामान्य है। लेकिन अगर खाने पर नियंत्रण न रहना बार-बार हो, बहुत ज्यादा परेशानी पैदा करे या अपराधबोध महसूस होने लगे, तो डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
आखिरकार, पेट भरने के बाद खाने का मन करना सिर्फ भूख का मामला नहीं है। इसमें शरीर के संकेत, स्वाद, भावनाएं और दिमाग की आदतें मिलकर भूमिका निभाती हैं। इन संकेतों को समझना यह पहचानने में मदद कर सकता है कि हमें सच में भोजन चाहिए या हम सिर्फ खाने का आनंद लेना चाहते हैं।
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