
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। सफेद दाग कोई संक्रामक या छूत की बीमारी नहीं है, बल्कि त्वचा की एक ऐसी अवस्था है जिसमें शरीर के कुछ हिस्सों की त्वचा अपना प्राकृतिक रंग खो देती है और वहां सफेद चकत्ते दिखाई देने लगते हैं। आज विश्व विटिलिगो दिवस है।
त्वचा रोग विशेषज्ञ डा. अक्षय सक्सेना ने कहा कि यह समस्या तब उत्पन्न होती है जब त्वचा को रंग प्रदान करने वाली कोशिकाएं, जिन्हें मेलानोसाइट्स कहा जाता है, कार्य करना बंद कर देती हैं या नष्ट हो जाती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि विटिलिगो किसी व्यक्ति के संपर्क में आने, साथ बैठने, भोजन साझा करने या छूने से नहीं फैलता है।
विटिलिगो मुख्य रूप से सौंदर्य संबंधी समस्या है और अधिकांश मामलों में इससे कोई शारीरिक दर्द या गंभीर परेशानी नहीं होती। हालांकि समाज में फैली गलत धारणाओं और भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण मरीजों को मानसिक और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है।
डा. सक्सेना ने कहा कि आज भी कई लोग सफेद दाग को गलत खान-पान, पूर्व जन्म के कर्मों या संक्रामक रोग से जोड़कर देखते हैं, जबकि इन मान्यताओं का कोई विज्ञानी आधार नहीं है। विटिलिगो से प्रभावित व्यक्ति सामान्य लोगों की तरह पढ़ाई, नौकरी, विवाह, खेलकूद और अन्य सामाजिक गतिविधियों में पूरी तरह सक्षम होता है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में विटिलिगो के उपचार के कई प्रभावी विकल्प उपलब्ध हैं। इनमें दवाइयां, फोटोथेरेपी, एक्साइमर लाइट, लेजर आधारित उपचार और कुछ मामलों में सर्जिकल तकनीकें शामिल हैं। मरीज की स्थिति के अनुसार त्वचा रोग विशेषज्ञ उचित उपचार योजना तैयार करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सफेद दाग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर तुरंत त्वचा रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। समय पर उपचार से रोग की प्रगति को नियंत्रित करने और त्वचा का रंग वापस लाने की संभावना बढ़ जाती है।
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