हुसैन बोहरा, आंबुआ।

आदिवासी बहुल क्षेत्र मप्र के आलीराजपुर और झाबुआ तथा गुजरात के दाहोद और छोटा उदयपुर के व्यापारी वर्ग में बड़ा हिस्सा दाऊदी बोहरा समाजजनों का है। यहां शहर से लेकर गांव-फलियों तक बोहरा व्यापार करते मिल जाएंगे। बहुत कम लोग यमन से गुजरात और यहां से आदिवासी जिलों में आकर बसने का बोहरा समाजजनों का इतिहास जानते हैं। इसे लेकर पढ़िए यह रिपोर्ट-

दाऊदी बोहरा समाज के जानकार मुस्तफा आरिफ ने बताया कि करीब 500 साल पहले फातेमी दावत के प्रचारक यमन से भारत आए थे। शांति और विकासप्रिय इस समुदाय के लोगों ने इस्लामिक शिया संप्रदाय की नींव भारत में सबसे पहले बंदरगाह खंभात में रखी। यमन से आकर अपना मुख्यालय भारत में बनाने वाले धर्मगुरु सैयदना दाऊद बिन अजब शाह थे। प्रारंभ में जुड़ने वाले गुजरात के बोहरा यानी व्यापारी वर्ग के लोग थे, इसलिए यह संप्रदाय शिया दाऊदी बोहरा समाज के नाम से जाना जाने लगा। भारत में अहमदाबाद, सूरत, उज्जौन, जामनगर आदि स्थानों से होता हुआ अब समाज का प्रशासनिक मुख्यालय मुंबई में है। सौम्य, सरल व सहयोगी प्रवृत्ति शिया दाऊदी बोहरा समाज का नैसर्गिक गुण है। इसी विशेषता ने समाज को कट्टर और उग्र स्वरूप से अब तक बचाए रखा है। बोहरा समाज ने अपनी माटी, अपना देश का सिद्घांत कभी नहीं छोड़ा। समय के साथ व्यापार के सिलसिले में बोहरा समाजजन विभिन्न अंचलों में बसते चले गए। इस समाज का एक बड़ा वर्ग आज गुजरात और मप्र के आदिवासी बहुल जिलों में भी निवास कर रहा है।

दावत के इतिहास का स्वर्णिम युग रहे यह 50 साल

मुस्तफा आरिफ बताते हैं कि 52वें धर्मगुरु सैयदना डा. मोहम्मद बुरहानुद्दीन का कालखंड समाज के लिए खासतौर पर उत्कर्षकारी रहा। तत्कालीन सैयदना का कार्यकाल करीब 50 साल का रहा। इन 50 सालों में बोहरा समाज ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उनका कार्यकाल दावत के इतिहास का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। वे केवल दूरदृष्टि वाले धर्मगुरु ही नहीं थे, अपितु दार्शनिक और समाजशास्त्री भी थे। सैयदना साहब के सिद्घांतों को अपनाते हुए आज बोहरा समाज अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। आदिवासी अंचल की बात करें तो यहां के व्यापार जगत में बोहरा समाज की एक खास जगह है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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