Achary Vidhyasagar Ji Maharaj : योगेश कुमार गौतम, नई दुनिया, बालाघाट। विश्व वंदनीय राष्ट्र संत आचार्य भगवंत 108 श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का सल्लेखना पूर्वक महाप्रयाण हो गया। चंद्रगिरी डोंगरगढ़ (छत्तीसगढ़) में उन्होंने देर रात देह त्याग दी। उनके सल्लेखना पूर्वक समाधि लेने के बाद बालाघाट जिले में भी जैन अनुयायियों व भक्तजनों में शोक व्याप्त है। लाेगों ने विद्यासागर जी महाराज द्वारा आध्यात्मिक चेतना जगाने के प्रयासों तथा बालाघाट से जुड़े उनके संस्मरण याद किए। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का बालाघाट से गहरा लगाव रहा। वर्ष 1991 में गोंदिया में प्रवचन देने पहुंचे महाराज महज अपनी जिज्ञासा पूर्ण करने बालाघाट की पावन धरा में पधारे थे। उनका ये कौतूहल उस बाघिन के दो शावकों को देखने का था, जिसका शिकारियों ने शिकार कर लिया था। जंगल में बेसहारा शावकों को वन विभाग ने रेस्क्यू किया और तत्कालीन डीएफओ (दक्षिण) के सरकारी बंगले में शावकों को रखा गया था।
श्री दिगंबर जैन महासमिति के सह संगठन मंत्री तथा श्री दिगंबर जैन पंचायत कमेटी के पूर्व अध्यक्ष संतोष जैन (देवड़िया) ने आचार्य विद्यासागर जी महाराज से जुड़ा एक रोचक संस्मरण याद करते हुए बताया- ये बात वर्ष दिसंबर 1991 की है। तब आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज गोंदिया (महाराष्ट्र) में प्रवचन देने पधारे थे। मैं और मेरे साथ सतेंद्र जैन मोटरसाइकिल से गोंदिया पहुंचे और वहां आचार्य जी के शिष्य एलक श्री निर्भय सागर जी महाराज से आचार्य विद्यासागर जी महाराज को बालाघाट पधारने का निमंत्रण दिया। इस पर आचार्य विद्यासागर जी ने बुंदेलखंडी अंदाज में मजाक करते हुए हमसे पूछा कि बालाघाट में ऐसी क्या अद्भुत चीज है? हमनें उन्हें बताया कि कुछ दिन पहले एक बाघिन का कुछ शिकारियों ने शिकार कर लिया है। उसके दो नन्हे शावकों का रेस्क्यू कर उन्हें वन अधिकारी के बंगले में रखा गया है। गाय का दूध पिलाकर शावकों का लालन-पोषण कर रहे हैं। ये सुनकर आचार्य जी ने अपने शिष्य की तरफ इशारा किया। कुछ देर बाद श्री निर्भय सागर जी महाराज ने हमें बताया कि आचार्य विद्यासागर जी अब संभवत: बालाघाट पधार सकते हैं। अगले ही दिन आचार्य जी ने गोंदिया से बालाघाट के लिए विहार कर लिया।
संतोष जैन ने बताया कि बालाघाट पहुंचने के बाद हमने तत्कालीन डीएफओ (दक्षिण) रामगोपाल सोनी को आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के उनके बंगले पहुंचने की बात बताई। इतना सुनकर वे अवाक रह गए। मानो इतने बड़े संत का उनके घर में पधारना किसी सपने जैसा हो। उस दिन सुबह सामाजिक लोगों व अन्य संतों की उपस्थिति आचार्य श्री विद्यासागर जी तत्कालीन डीएफओ के बंगले में पहुंचे और बगीचे में बैठे दोनों शावकों को दूर से निहारा। कुछ देर तक टकटकी लगाकर शावकों को ध्यान से देखते रहे और अंत में प्रसन्नता व्यक्त की। आचार्य जी ने डीएफओ से शावकों के आहार की जानकारी ली, तो बताया कि शावक गाय के दूध पर आश्रित हैं। तीन दिन प्रवचन देने के बाद आचार्य श्री ने मंडला विहार किया।
श्री दिगंबर जैन पंचायत कमेटी के अध्यक्ष सुशील जैन ने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज चार बार बालाघाट पधार चुके हैं। उनके प्रवचनों में अहिंसा परमो धर्म: का संदेश प्रमुखता से समाहित रहता था। उन्होंने भक्तों को हमेशा अहिंसा के मार्ग पर चलने की सीख दी। आचार्य श्री पहली बार वर्ष 1984 में बालाघाट पधारे थे। इसके बाद अलग-अलग समय में वह लगभग चार बार बालाघाट के भक्ताें को अपने दर्शन दे चुके हैं। सुशील जैन ने बताया कि रविवार को आचार्य श्री के सल्लेखना पूर्वक समाधि लेने की खबर सुनते ही बालाघाट से बड़ी संख्या में लोग बस, कार से चंद्रगिरी डोंगरगढ़ पहुंचे। वहीं, शहर में समाज के लोगों ने अपने प्रतिष्ठान बंद रखे। श्री जैन ने बताया कि ऐसे तपस्वियों की आत्मा अगले जन्म में उर्द गति से गमन करती है और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। आने वाले दिनों में समाज द्वारा श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाएगा।