बड़वानी(नईदुनिया प्रतिनिधि)।प्राचीन समय में गुरु-शिष्य संबंध गहन हुआ करते थे। वर्तमान में गुरु-शिष्य संबंधों में शिथिलता आ रही है। वर्तमान में शिक्षा प्रणाली और गुरु-शिष्य परंपरा का स्वरूप बदलता जा रहा है। सही मायने में शिक्षक वही है जो अपने विद्यार्थियों के बीच आपसी विश्वास और स्नेह को बनाए रख सकें। विद्यार्थियों की हर समस्या का समाधान कर सकें एवं उन्हें भावनात्मक रूप से सहायता कर सकें।
प्रवेश एवं फीस नियामक समिति भोपाल के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ शिक्षाविद डा आरआर कान्हेरे ने यह बात कही। वे यहां पर शहर के शासकीय कन्या महाविद्यालय में गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।डा कान्हेरे ने गुरु-शिष्य परंपरा और शिक्षा का महत्व बताते हुए कहा कि वर्तमान में आधुनिक शिक्षा प्रणाली में भी इस परंपरा का निर्वाह पहले की भांति ही होना चाहिए।भगवत गीता को लेकर उन्होंने कहा कि गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें सभी प्रकार की शिक्षा का समावेश है।कार्यक्रम में विशेष अतिथि अवधेश प्रतापसिंह विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा शिवनारायण यादव रहे।कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य डा पुरुषोत्तम गौतम ने की।कार्यक्रम की शुरुआत में अतिथियों ने मां सरस्वती का पूजन कर दीप प्रज्वलित किए।छात्राओं ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।प्राचार्य डा. गौतम, डा. वंदना भारती, डा. कविता भदौरिया, डा. जगदीश मुजाल्दे, शशांक कानूनगो ने अतिथियों का स्वागत किया।
गुरु वह जो अपने ज्ञान के प्रकाश से अंधकार को दूर करें
कार्यक्रम के विशेष अतिथि डा शिवनारायणजी यादव ने अपने उद्बोधन में गुरु शब्द का अर्थ बताते हुए कहा कि गुरु शब्द की उत्पत्ती अवधि भाषा से हुई है। गुरु वह है जो अपने ज्ञान के प्रकाश से अंधकार को दूर करें और ज्ञान का प्रसार करें।उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा का उदाहरण देते हुए गुरु द्रोणाचार्य एवं एकलव्य की कहानी बताते हुए कहा कि गुरु द्रोणाचार्य क्षत्रियों के गुरु थे। उन्होनें एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया था। तब बालक एकलव्य ने गुरु की एक मूर्ति स्थापित कर धनुर्विद्या सीखी। गुरु द्रोणाचार्य को पता लगने पर उन्होंने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। जिसे एकलव्य ने सहर्ष काटकर दे दिया। इससे स्पष्ट है कि गुरु-शिष्य का संबंध श्रद्धा, विश्वास और सम्मान पर आधारित है। इसे ही सच्ची गुरु भक्ति कहा जाता है।
50 पौधे लगाकर दिलाई पर्यावरण संरक्षण की शपथ
कार्यक्रम का संचालन करते हुए करियर सेल प्रभारी डा. कविता भदौरिया ने बताया कि आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि का मार्गदर्शन प्राचार्य के रूप में मिलता रहा है। आपके मार्गदर्शन में पर्यावरण शिक्षा अर्थात पौधारोपण एवं संरक्षण का कार्य निरंतर महाविद्यालय द्वारा किया जाता रहा है।कार्यक्रम में हरित शपथ ली गई। 50 फलदार पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई गई।हरित शपथ प्रो. प्रियंका शर्मा ने दिलाई तथा आभार वाणिज्य विभाग से डा. शिल्पी गुप्ता ने माना। सभी पदाधिकारियों ने सिंगल यूज पालीथिन के खिलाफ कपड़े की थैली का इस्तेमाल करने का आह्वान किया।इस अवसर पर महाविद्यालय के सभी शिक्षक, विद्यार्थी और स्टाफकर्मी उपस्थित रहे।