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मध्य प्रदेश में कल-कल बहती पौराणिक बेतवा नदी के सूखने का दर्द बना जन आंदोलन

भोपाल से 15 किमी झिरी में बेतवा नदी का उद्गम सूख गया तो जन आंदोलन शुरू हुआ।

By Abrar KhanEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Sat, 13 Jun 2026 11:57:48 AM (IST)Updated Date: Sat, 13 Jun 2026 12:05:21 PM (IST)
मध्य प्रदेश में कल-कल बहती पौराणिक बेतवा नदी के सूखने का दर्द बना जन आंदोलन
2024 तक बहता था पानी, नदी को गोमुख पूरी तरह सूख गया।

HighLights

  1. मई 2026 में श्रमदान से पार्वती कुंड की 6-8 फीट मिट्टी हटाई, कुछ घंटों में पानी भर गया
  2. 2025 में 55 और 2026 में 28 चेक डैम बनाकर कुल 83 तैयार किए गए
  3. डॉ. आरके पालीवाल, डॉ. सुरेश गर्ग के नेतृत्व में बेतवा संरक्षण समिति बनी

मोहम्मद अबरार खान, नवदुनिया, भोपाल। पुराणों में मां वेत्रवती, महाकवि कालिदास के मेघदूत में वर्णित और बुंदेलखंड की जीवनरेखा कही जाने वाली बेतवा नदी जब अपने ही उद्गम स्थल पर सूख गई, तो कुछ लोगों ने इसे नियति मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने नदी बचाने का बीड़ा उठाया और देखते ही देखते यह प्रयास जन आंदोलन में बदल गया।

विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस (17 जून) पर बेतवा की कहानी इसका जीवंत उदाहरण है कि जनभागीदारी और वैज्ञानिक सोच मिल जाए तो सूखते जलस्रोतों में भी जीवन लौट सकता है। भोपाल से करीब 15 किलोमीटर दूर झिरी स्थित बेतवा के उद्गम स्थल पर पिछले दो वर्षों से चल रहे अभियान के परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं।


कुछ ही घंटों में कुंड में जल भर गया

मई 2026 में आयोजित श्रमदान सप्ताह के दौरान मलबे में दबे पार्वती कुंड आदि झिर का पुनरुद्धार किया। हाइड्रोलाजिस्ट सुनील चतुर्वेदी के मार्गदर्शन में छह से आठ फीट तक मिट्टी और मलबा हटाया। खुदाई पूरी होते ही तीन दिशाओं से पानी रिसने लगा और कुछ ही घंटों में कुंड में जल भर गया।

भीषण गर्मी में यह जलस्रोत वन्यजीवों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए राहत बन गया है। अभियान के संयोजक डॉ. आरके पालीवाल और डॉ. सुरेश गर्ग बताते हैं कि पार्वती कुंड का पुनर्जीवन केवल एक जलस्रोत की बहाली नहीं, बल्कि बेतवा के पुनर्जन्म की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

चिंता से शुरू हुआ अभियान

बेतवा के सूखते उद्गम को लेकर नौ मार्च 2025 को वेबिनार में पर्यावरणविदों ने चिंता जताई थी। इसके बाद विश्व जल दिवस 22 मार्च 2025 को झिरी में मंथन हुआ। इसी से बेतवा नदी अध्ययन एवं जनजागरण यात्रा समूह, बेतवा उत्थान समिति विदिशा और अन्य संगठनों के सहयोग से अभियान की शुरुआत हुई।

ऐसे बनी बेतवा संरक्षण समिति

मप्र-छग के पूर्व प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त डॉ. आरके पालीवाल कहते हैं कि नदी बचाना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है। इसी सोच से सामाजिक व पर्यावरणीय संगठनों को जोड़कर बेतवा संरक्षण समिति बनाई गई। इसमें विदिशा से डॉ. सुरेश गर्ग, प्रो. अरविंद द्विवेदी, भोपाल से आईएफएस कौशलेंद्र सिंह, आजाद सिंह डबास, परिक्षित सिंह सहित अनेक लोग जुड़े।

मुख्यमंत्री ने यहीं से की थी जल गंगा अभियान की घोषणा

डॉ. पालीवाल बताते हैं कि 2024 में जब बेतवा का उद्गम स्थल सूख गया, तब यहां जनजागरण कार्यक्रम किया था। कार्यक्रम में सीएम डॉ. मोहन यादव मुख्य अतिथि थे और उन्होंने यहीं से जल गंगा अभियान की घोषणा की थी।

हमारी पीढ़ी ने मां वेत्रवती को सूखते देखा

बेतवा के महत्व को याद करते हुए डॉ. पालीवाल भावुक हो जाते हैं। वे कहते हैं कि यह वही नदी है जिसका उल्लेख कालिदास ने मेघदूत में किया है। ओरछा का प्रसिद्ध राजा राम मंदिर, भोजपुर का विश्वविख्यात शिव मंदिर और भीमबेटका का क्षेत्र इसकी जलधारा से जुड़ा रहा है।

क्यों सूख रही हैं नदियां

पर्यावरण विशेषज्ञ प्रो. सौरभ पोपली के अनुसार नदियों पर बढ़ते खतरे अब उन पर निर्भर शहरों, उद्योगों व पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। वे बताते हैं कि बेतवा के सूखने का एक बड़ा कारण उद्गम क्षेत्र के आसपास खेती के लिए किए अवरोध व गर्मी के महीनों में भी होने वाली मूंग की खेती है, जिससे भूजल स्तर तेजी से गिरा और नदी की जलधारा कमजोर होती चली गई।

सूखे से लड़ाई का मॉडल

इस वर्ष विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस की थीम 'रेंजलैंड्स : रिकग्नाइज, रिस्पेक्ट एंड रिस्टोर' यानी 'चारागाहों को पहचानें, सम्मान दें और पुनर्स्थापित करें' रखी गई है। बेतवा के उद्गम स्थल पर चल रहा अभियान इसी भावना को आगे बढ़ाता है। यह बताता है कि सूखे और मरुस्थलीकरण से लड़ाई केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता से जीती जा सकती है।

दो वर्षों में बने 83 चेक डैम

वर्ष 2025 में स्वयंसेवकों ने श्रमदान से 55 चेक डैम बनाए। मई 2026 में अभियान का दूसरा चरण चला, जिसमें 28 नए चेक डैम तैयार किए गए। इस तरह दो वर्षों में कुल 83 चेक डैम बन चुके हैं। 200 बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों ने पत्थर ढोए, मिट्टी हटाई और नदी को फिर से जीवित करने का प्रयास किया।

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