भोपाल (नवदुनिया प्रतिनिधि)। प्रदेश के धार जिले में बन रही मान सिंचाई परियोजना से हो रहे विस्थापितों को 30 साल बाद न्याय मिला है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित अपीलीय फोरम ने विस्थापितों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए विस्थापितों को पुनर्वास नीति के अनुसार जमीन देने का आदेश दिया है। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने उक्त फैसले पर खुशी जताई है। पदाधिकारियों का कहना कि यह मान बांध प्रभावितों के धैर्यपूर्ण संघर्ष की जीत है।

यह है मामला

धार जिले में नर्मदा की सहायक नदी मान पर बन रही मान सिंचाई परियोजना से 17 आदिवासी गांव प्रभावित हुए हैं। इन विस्थापितों को सन 1990-91 में पुनर्वास नीति के तहत जमीन के बदले जमीन न देकर गैर कानूनी रूप से बहुत थोड़ा सा मुआवजा दिया था। सन 1997 में जब लोगों को बिना पुनर्वास के भगाने का प्रयास किया गया तब नर्मदा बचाओ आंदोलन के तहत विस्थापितों का संघर्ष प्रारम्भ हुआ। लोगों ने बांध पर कब्ज़ा, सत्याग्रह किया, कई बार जेल में गये। अंत मे सरकार को सन 2001 में 11 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज देना पड़ा। यह पैकेज भी पुनर्वास नीति के अनुरूप न होने के कारण कई विस्थापितों ने शिकायत निवारण प्राधिकरण के समक्ष अपने अधिकारों की मांग की।

शिकायत निवारण प्राधिकरण द्वारा बिना आधार विस्थापितों की मांग खारिज करने पर नर्मदा आंदोलन के द्वारा उच्च न्यायालय में अपील की गई। सन 2009 में उच्च न्यायालय के फैसले के बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा। सन 2012 में सर्वोच्च न्यायालय ने विस्थापितों के दावों पर निर्णय लेने के लिये उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में अपीलीय फोरम का गठन किया। इसी अपीलीय फोरम ने राज्य सरकार को विस्थापितों को जमीन देने का आदेश दिया है।

क्या है आदेश

सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश शम्भू सिंह की अध्यक्षता में अपीलीय फोरम का गठन किया गया है जिसमें सेवानिवृत्त जिला जज तारकेश्वर सिंह न्यायायिक व आईएएस रजनी सिंह प्रशासनिक सदस्य हैं। फोरम द्वारा विस्थापितों की अपील पर विस्तार से सुनवाई की गई। सभी पक्षों को सुनने के बाद फोरम ने अपने आदेश में कहा है कि राज्य सरकार द्वारा मान बांध प्रभावितों के पुनर्वास के लिये बनी पुनर्वास नीति का पालन नहीं किया है। सरकार द्वारा न तो विस्थापितों को जमीन के बदले न्यूनतम 2 हेक्टर जमीन देने के प्रावधान बताया गया और न ही उन्हें जमीन आवंटित की गई। पुनर्वास नीति के अनुसार जमीन का अधिकार तभी जा सकता है जब विस्थापित ने ऐसा कोई आवेदन किया हो और कलेक्टर द्वारा जांच की गई हो कि इससे विस्थापित का हित प्रभावित नहीं होगा। परंतु न तो ऐसा कोई आवेदन किया गया और न ही कलेक्टर द्वारा कोई जांच की गई अतः विस्थापितों को जमीन प्राप्त करने का अधिकार बरकरार है।

फोरम ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि विस्थापित द्वारा आवेदन करने के 3 माह के अंदर पुनर्वास नीति के अनुसार विस्थापितों को जमीन का आवंटन किया जाये। अपीलीय फोरम के समक्ष विस्थापितों का पक्ष अधिवक्ता भरत चितले और अधिवक्ता अंजुम पारिख ने रखा।

Posted By: Lalit Katariya

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

 
Show More Tags