भोपाल में कंज्यूमर फोरम का आदित्य बिरला इंश्योरेंस पर बड़ा फैसला: बीमारी छिपाने का बहाना बनाकर रोका क्लेम, पीड़िता को मिलेंगे ₹60 लाख
आयोग ने दोनों पक्षों के दस्तावेजों और दलीलों का परीक्षण में पाया कि कंपनी पॉलिसी जारी होने से पहले के पर्याप्त मेडिकल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सकी।
Publish Date: Mon, 21 Sep 2026 03:55:32 PM (IST)Updated Date: Mon, 21 Sep 2026 03:55:32 PM (IST)
प्रतीकात्मक फोटो।HighLights
- बीमारी छिपाने के आरोप पर रोका बीमा क्लेम
- उपभोक्ता आयोग ने 60 लाख देने के आदेश दिए
- 35 हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति भी देनी होगी
नईदुनिया प्रतिनिधि,भोपाल । जीवन बीमा का उद्देश्य बीमाधारक की मृत्यु के बाद उसके आश्रितों को आर्थिक सुरक्षा देना है। लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी छिपाने का आरोप लगाकर बीमा दावा खारिज करने के मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
आयोग ने संबंधित कंपनी आदित्य बिरला सन लाइफ इंश्योरेंस को मृतक की पत्नी को 60 लाख रुपये की बीमा राशि देने का आदेश दिया है। इसके अलावा 31 मार्च 2019 से भुगतान तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, मानसिक क्षतिपूर्ति के लिए 35 हजार रुपये भी देने होंगे।
लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी का मामला
मामले में पुष्पा अग्रवाल ने आयोग को बताया कि उनके पति अशोक कुमार ने कंपनी से जीवन बीमा पॉलिसी ली थी। बीमित अवधि के दौरान 21 जनवरी 2019 को दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद पुष्पा ने बीमा दावा प्रस्तुत किया लेकिन कंपनी ने 31 मार्च 2019 को दावा खारिज कर दिया।
तर्क दिया गया कि अशोक कुमार ने बीमा प्रस्ताव फार्म में अपने स्वास्थ्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां नहीं दी थीं। कंपनी के अनुसार उन्हें पहले से उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी समस्या और सेरेब्रोवस्कुलर बीमारी थीं।
आयोग अध्यक्ष योगेश दत्त शुक्ल, सदस्य डॉ. प्रतिभा पांडेय और डॉ. संजीव सिंह की पीठ ने दावा निरस्त करने को सेवा में कमी माना और शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया।
पुराने मेडिकल रिकॉर्ड नहीं कर सकी पेश
उपभोक्ता की ओर से आयोग को बताया गया कि पॉलिसी जारी करने से पहले कंपनी के अधिकृत चिकित्सक ने बीमाधारक का मेडिकल परीक्षण किया था। आयोग ने दोनों पक्षों के दस्तावेजों और दलीलों का परीक्षण में पाया कि कंपनी पॉलिसी जारी होने से पहले के पर्याप्त मेडिकल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सकी।
कंपनी द्वारा पेश किए गए उपचार संबंधी दस्तावेज पॉलिसी जारी होने के बाद के थे। जिनसे यह साबित नहीं होता कि बीमाधारक पहले से बीमार था या फिर उसने जानबूझकर जानकारी छिपाई।