
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्य प्रदेश में अब कोई भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी उद्योग, व्यापार या निवेश से जुड़ी फाइलों को अटका कर नहीं रख सकेगा। राज्य सरकार ने 'मध्यप्रदेश ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अधिनियम, 2026' के माध्यम से एक नई डिजिटल प्रणाली लागू की है, जो तय समय-सीमा में काम न करने वाले अधिकारियों की शक्तियां स्वतः छीन लेगी।
प्रशासनिक लेटलतीफी को खत्म करने के लिए लागू इस व्यवस्था में समय पर मंजूरी न देने वाले अफसरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई और वेतन से पेनल्टी काटने का प्रावधान किया गया है।
पुरानी व्यवस्था में निवेशकों और कारोबारियों को अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) या विभिन्न स्वीकृतियों के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। कई बार फाइलें महीनों तक एक ही टेबल पर लंबित रहती थीं।
नए कानून (अध्याय-5, धारा 13 (1)) का मुख्य आधार 'स्वतः वृद्धि' यानी 'Auto-Escalation' तकनीक है।
प्रशासनिक अड़ंगों को समाप्त करने के लिए धारा 12 के तहत 'सिर्फ एक बार सवाल' पूछने की व्यवस्था लागू की गई है।
कानून के अध्याय-8 की धारा 20 में समय-सीमा में कार्य न करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों को दंडित करने का कड़ा नियम है।
लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत कार्रवाई: तय समय में स्वीकृति न देने वाले अधिकारी पर 'मध्यप्रदेश लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम, 2010' के तहत प्रतिदिन के हिसाब से पेनल्टी लगाई जाएगी।
यह जुर्माना संबंधित विभाग के खाते से नहीं, बल्कि दोषी अधिकारी के व्यक्तिगत वेतन (सैलरी) से वसूला जाएगा।
यह भी पढ़ें- ग्वालियर पुलिस का बड़ा एक्शन... 13 अवैध बांग्लादेशी नागरिक पकड़ाए, डिपोर्टेशन के लिए भेजा गया बंगाल
अधिनियम की धारा 7 के अनुसार, राज्य के सभी संबंधित विभागों (जैसे राजस्व, पर्यावरण, ऊर्जा, श्रम आदि) को आगामी 6 महीनों के भीतर उद्योग और व्यापार संबंधी अपनी स्वीकृतियों के अधिकार 'राज्य नोडल एजेंसी' (MPIDC) को हस्तांतरित करने होंगे।
इस व्यवस्था से सभी विभागों की कार्यप्रणाली एक मंच पर आ जाएगी। राज्य स्तर पर मुख्य सचिव और जिला स्तर पर कलेक्टर सीधे तौर पर आवेदनों के निस्तारण और अधिकारियों की कार्यशैली पर निगरानी रखेंगे।