
प्रशांत व्यास, नईदुनिया, भोपाल। साइबर ठगी की रकम बचाने के लिए पुलिस और एनसीसीआरपी की त्वरित कार्रवाई अब साइबर गिरोहों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। इसका तोड़ निकालते हुए देशभर में सक्रिय साइबर सरगनाओं ने ठगी का नया नेटवर्क खड़ा कर लिया है।
अब हर बड़े शहर में ''कैश-आउट एजेंट'' या ''कमीशन एजेंट'' तैनात किए जा रहे हैं, जिनका काम साइबर ठगी की रकम बैंक खाते में पहुंचते ही कुछ ही मिनटों में एटीएम से निकाल लेना होता है। इसके बाद यही रकम कैश डिपोजिट मशीन (सीडीएम) के जरिए दोबारा साइबर गिरोह के सरगनाओं तक पहुंचा दी जाती है। पूरी प्रक्रिया इतनी तेज होती है कि अधिकांश मामलों में पीड़ित के 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराने से पहले ही बैंक खाता खाली हो चुका होता है।
पुलिस जांच में सामने आया है कि साइबर गिरोह कार्रवाई से बचने के लिए पूरे अपराध को तीन राज्यों में बांट देते हैं। एक राज्य में बैठकर लोगों से साइबर ठगी की जाती है, दूसरे राज्य के म्यूल बैंक खातों में रकम ट्रांसफर की जाती है और तीसरे राज्य में बैठे एजेंट एटीएम से नकदी निकाल लेते हैं।
इसके बाद कैश डिपोजिट मशीन के जरिए रकम सरगनाओं तक पहुंचा दी जाती है। इस तरह अपराध की पूरी चेन अलग-अलग राज्यों में बिखर जाती है, जिससे किसी एक राज्य की पुलिस के लिए पूरे नेटवर्क तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है।
अब तक साइबर ठग ठगी की रकम को कई बैंक खातों में ट्रांसफर कर उसकी लेयरिंग करते थे, लेकिन एनसीसीआरपी पोर्टल पर शिकायत मिलते ही संदिग्ध खातों को फ्रीज किया जाने लगा। इससे करोड़ों रुपये ठगों तक पहुंचने से पहले ही रुकने लगे।
इसी वजह से गिरोहों ने अपनी पूरी मोडस ओपरेंडी बदल दी। अब किसी भी म्यूल बैंक खाते का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता। हर साइबर ठगी के लिए नया बैंक खाता उपयोग में लाया जाता है। रकम खाते में पहुंचते ही शहर में बैठे एजेंट तत्काल एटीएम से नकदी निकाल लेते हैं। इस पूरे काम के बदले एजेंटों को दो से तीन प्रतिशत तक कमीशन दिया जाता है।
इस नई मोडस ओपरेंडी का खुलासा हाल ही में कोहेफिजा थाना पुलिस की जांच के दौरान हुआ। हमीदिया अस्पताल की एक एमबीबीएस डॉक्टर ऑनलाइन गेम खेलते समय करीब एक लाख रुपये की साइबर ठगी का शिकार हो गई थीं।
जांच में सामने आया कि डॉक्टर के दस्तावेजों में राजस्थान का पता दर्ज था। इसी वजह से साइबर ठग भ्रमित हो गए और उन्होंने ठगी की रकम भोपाल में बैठे अपने कमीशन एजेंटों के कब्जे वाले बैंक खातों में ट्रांसफर कर दी। जिन म्यूल खातों का इस्तेमाल किया गया, उनके वास्तविक खाताधारक छत्तीसगढ़ के निवासी हैं, जबकि रकम भोपाल से निकाली गई। मामला भोपाल में दर्ज होने और यहीं से एजेंटों द्वारा नकदी निकासी होने के कारण पुलिस नेटवर्क तक पहुंच गई।
जोधपुर निवासी एजेंट महेश और विकास छात्र हैं। उन्होंने साइबर ठग से सीधे संपर्क होने की बात की है और उनके लिए काम करना बताया। पूछताछ में दोनों ने बताया कि उनके ही तरह चेन्नई समेत कई बड़े शहरों में ऐसे एजेंट हैं, जो कि ठगी की रकम निकालकर मास्टरमाइंड के खातों में भेजते हैं।
पूछताछ में खुलासा हुआ कि करतार सिंह नामक म्यूल अकाउंट एजेंट की मुलाकात तिहाड़ जेल में साइबर ठगी के मामले में बंद राजस्थान के एक साइबर सरगना के भाई से हुई थी। जेल से बाहर आने के बाद दोनों के बीच नेटवर्क तैयार करने की डील हुई। इसके बाद पिछले करीब एक वर्ष में करतार देशभर में सैकड़ों बैंक खाते खुलवाकर गिरोह को उपलब्ध करा चुका है।
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जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह केवल ऐसे करंट खाते या उच्च निकासी सीमा वाले बैंक खाते खरीदता है, जिनसे प्रतिदिन कम से कम एक लाख रुपये निकाले जा सकें। इन खातों के डेबिट कार्ड, पासबुक और अन्य दस्तावेज पहले से ही कमीशन एजेंटों के पास रहते हैं, ताकि ठगी की रकम आते ही बिना देरी उसे निकाल लिया जाए।
कोहेफिजा पुलिस ने ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो साइबर ठगी के मास्टरमाइंड के लिए सीधे काम करता था। ये आरोपित ठगी की रकम म्यूल खातों से तत्काल एटीएम से निकालकर आगे जमा कर देते थे, ताकि पुलिस की ट्रेल टूट जाए। - संजय कुमार, पुलिस कमिश्नर