
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। संघ प्रमुख मोहन भागवत शुक्रवार को भोपाल में थे। यहां उन्होंने कहा कि सिर्फ भाजपा को देखकर संघ के बारे में विचार न बनाएं, संघ किसी का रिमोट कंट्रोल नहीं है। अब समय आ गया हिंदू शक्ति के रूप में आए.. जो हिंदू भूल गए हैं उन्हें साथ लेकर आएं। वे संघ के 100 साल पूरे होने पर भोपाल में प्रमुख जन संगोष्ठी में बोल रहे थे। भाषा विवाद पर वे बोले कि जिस राज्य में रहते वहां की भाषा आना ही चाहिए। तीन भाषा आना चाहिए.. एक राज्य. एक देश और एक दुनिया की भाषा। हमें चीन से सीखना चाहिए कि बड़ा राष्ट्र कैसे बनाया जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भोपाल के रवींद्र भवन में आयोजित 'प्रबुद्ध जन सम्मेलन' को संबोधित करते हुए संघ के विचार, कार्यपद्धति और भविष्य के लक्ष्यों पर विस्तार से चर्चा की। संघ के शताब्दी वर्ष (सौ साल पूरे होने) के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य आम लोगों तक संघ की सही तस्वीर पहुँचाना था। अपने संबोधन में उन्होंने हिंदुत्व की परिभाषा से लेकर भाजपा और विहिप जैसे संगठनों के साथ संघ के रिश्तों पर दो-टूक बात कही।
मोहन भागवत ने हिंदुत्व की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू कोई जाति नहीं है, बल्कि यह विभिन्न समाजों की एक जैसी मनोवृत्ति और स्वभाव है। उन्होंने कहा, "हिंदू नाम इसलिए दिया गया क्योंकि हम सभी पंथों और संप्रदायों को मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं। हिंदू, हिंदवी और भारत—ये तीनों एक ही हैं। 'हिंदू' कहने से हम सब एक सूत्र में बंधते हैं। यह केवल एक धर्म नहीं, बल्कि भारत का मूल स्वभाव है।"
उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ का विचार कोई नया या अलग विचार नहीं है, बल्कि यह सनातन काल से चला आ रहा विचार है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के रिश्तों पर भ्रम को दूर करते हुए सरसंघचालक ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अगर आप भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) या विद्या भारती को देखकर संघ को समझने की कोशिश करेंगे, तो आप संघ को कभी नहीं समझ पाएंगे।
भागवत ने स्पष्ट किया, "संघ का काम सिर्फ स्वयंसेवक तैयार करना है। संघ उन्हें विचार, संस्कार और लक्ष्य देता है। इसके बाद ये स्वयंसेवक समाज के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर काम करते हैं। भाजपा या विहिप के काम करने का तरीका अलग है, वे अपना काम स्वतंत्र रूप से करते हैं। उन्हें संस्कार संघ ने दिया है, लेकिन उनके कार्यों से संघ को परिभाषित नहीं किया जा सकता।"
संघ के संघर्षों को याद करते हुए भागवत ने कहा कि दुनिया में शायद ही किसी संगठन का इतना विरोध हुआ हो, जितना आरएसएस का हुआ है। संघ के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया, हत्याएं हुईं, लेकिन स्वयंसेवकों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने संघ की आर्थिक शुचिता पर बात करते हुए कहा कि संघ कभी किसी से चंदा नहीं मांगता। यह संगठन पूरी तरह से स्वयंसेवकों द्वारा दी गई 'गुरुदक्षिणा' से संचालित होता है।
संघ के विस्तार की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में संघ के पास लगभग 60 लाख स्वयंसेवक हैं, लेकिन देश की आबादी 100 करोड़ से अधिक है और सवा लाख से ज्यादा गांव हैं। ऐसे में संघ को अभी बहुत काम करना बाकी है। उन्होंने कहा कि आरएसएस की स्थापना किसी की स्पर्धा या विरोध में नहीं हुई थी, संघ अपने आप में पूर्ण है और इसका एकमात्र लक्ष्य संगठन का सुदृढ़ीकरण और समाज के हर व्यक्ति तक पहुंचना है।