इंदौर में दूषित पानी से मौतों के 11 दिन बाद सरकार ने पेयजल आपूर्ति के लिए बनाई एसओपी
सघन आबादी वाले क्षेत्रों में बिछी हुई 20 वर्ष से अधिक पुरानी पाइपलाइन का चिन्हांकन कर रिसाव को 48 घंटे के भीतर सुधारना होगा। जल शोधन संयंत्र (डब्ल्यूट ...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 03 Jan 2026 10:22:39 AM (IST)Updated Date: Sat, 03 Jan 2026 10:35:32 AM (IST)
मध्य प्रदेश सरकार ने शहरों में पानी सप्लाई के लिए तय किए मानक। फाइल फोटोHighLights
- दूषित पानी की शिकायत का 48 घंटे में करना होगा निराकरण
- सभी शहरों में पाइपलाइन लीकेज डिटेक्शन के लिए जन जागरूकता अभियान चलाए
- जल प्रदाय एवं सीवर नेटवर्क की जीआईएस आधारित होगी मैपिंग
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल के कारण हुई मौतों की घटना के 11 दिन बाद राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में जलापूर्ति प्रणाली को लेकर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग द्वारा शुक्रवार देर रात जारी की गई एसओपी में शहरी क्षेत्रों में जलापूर्ति प्रणाली की अनुरक्षण व्यवस्था, पाइपलाइन रिसाव पहचान, पेयजल गुणवत्ता सुनिश्चित करने एवं शिकायत निवारण तंत्र सुदृढ़ीकरण के मानक प्रक्रिया तय कर दी है। अब शहर में जल वितरण प्रणाली का सात दिन में सर्वे करना होगा।
सघन आबादी वाले क्षेत्रों में बिछी हुई 20 वर्ष से अधिक पुरानी पाइपलाइन का चिन्हांकन कर रिसाव को 48 घंटे के भीतर सुधारना होगा। जल शोधन संयंत्र (डब्ल्यूटीपी) तथा उच्च स्तरीय टंकियां (ओएचटीस), संप टेंक्स की साफ-सफाई का सात दिवस के अंदर निरीक्षण किया जाएगा। यह एसओपी केंद्रीय लोक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण अभियंत्रण संगठन (सीपीएचईईओ) द्वारा जारी मैन्यूअल आन वाटर सप्लाई एंड ट्रीटमेंट तथा विश्व में अपनाई जा रही श्रेष्ठतम प्रथाओं को दृष्टिगत रखते हुए तैयार कर शहरी स्थानीय निकायों के लिए जारी की गई है।
जल जनित बीमारियां चिह्नित कर फैलने के कारणों को दूर करने के निर्देश
नगरीय निकायों के जिन क्षेत्रों में फैली जल जनित बीमारियां जैसे उल्टी-दस्त, हैजा आदि को चिन्हित कर बीमारियों के फैलने के कारणों को दूर करने कार्रवाई करें। इसके अलावा ऐसे क्रिटिकल क्षेत्रों जहां जलजनित बीमारियों की फैलने की आशंका हो (लो लाइन एरिया, नालों/नाली को क्रास कर बिछाई गई पाइपलाइन का क्षेत्र, ऐसा क्षेत्र जिसमें पाइपलाइन पुरानी होने के कारण टूट-फूट की अधिक शिकायतें प्राप्त होती है) का चिन्हाकन कर सूचीबद्ध करें। जल शोधन संयंत्र के विभिन्न घटकों, उच्च स्तरीय टंकियों, सम्पवेल एवं नलकूप स्त्रोत होने की स्थिति में नलकूप के आसपास साफ-सफाई का विशेष ध्यान दिया जाए।
जलापूर्ति प्रणाली में यह मानक प्रक्रिया भी की तय
- जल शोधन संयंत्र (डब्ल्यूटीपी) तथा उच्च स्तरीय टंकियां (ओएचटीस)/ संप टेंक्स की साफ-सफाई का सात दिवस के अंदर निरीक्षण कर तत्काल नमूना परीक्षण कराए।
- तय मानक अनुसार अनुमेय सीमा से अधिक प्रदूषण मिला तो तत्काल जलापूर्ति रोककर वैकल्पिक सुरक्षित जल आपूर्ति सुनिश्चित करें।
- क्लोरिनेशन सिस्टम की 24 घंटे सातों दिन निगरानी, उच्च स्तरीय टंकियों एवं प्रत्येक वार्ड/ डिस्ट्रिक्ट मेटेरिग एरियाज (डीएमएज) में संचालन-संधारण के अमले/ अमृत मित्र/ सफाई मित्र के माध्यम से रेंडम सेंपलिंग कर जल की गुणवत्ता का परीक्षण करें।
- चयनित हाउसहोल्ड ट्रेनिंग पर रिसिड्यूअल क्लोरीन के लिए रेंडम सेंपलिंग करें। रिसिड्यूअल क्लोरीन की मात्रा 0.2 पीपीएम से कम एवं 1 पीपीएम से अधिक नही हो।
- रिसिड्यूअल क्लोरीन की मात्रा कम मिलने पर डब्ल्यूटीपी/ओएचटीज पर क्लोरीन की बूस्टिंग करें।
- नगरीय क्षेत्र में जल के अन्य स्त्रोतों (कुंएं, बावड़ी, तालाब तथा नलकूपों) में ब्लीचिंग पाउडर की खुराक निर्धारित मानकों के अनुरूप करें।
- जल शोधन संयंत्रों, जल परीक्षण प्रयोगशालाओं में पर्याप्त मात्रा में आवश्यक रसायन (केमिकल) एवं उपकरणों की उपलब्धता हो।
- संभाग स्तर पर मोबाइल लैब में जल गुणवत्ता के परीक्षण के लिए फील्ड टेस्ट किट (एफटीके) का प्रविधान कर जीवाणु परीक्षण भी करें।
- नगरीय निकायों में जल शोधन संयंत्रों पर स्थापित लैब/ मोबाइल लैब/ एनएबीएल अधिकृत लेबोरेटरीज/ लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा स्थापित लैब से एकत्र कर पानी के सैंपल का परीक्षण आइएस मानक अनुसार निर्धारित अंतराल पर कराए।
- सभी नगरीय निकायों में पाइपलाइन लीकेज डिटेक्शन के लिए जन जागरूकता अभियान चलाए।
- निकाय के सीएमओ सहित जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों के दूरभाष/ मोबाइल नंबर विभाग/निकाय की वेबसाइट और कार्यालयों के सूचना पटल एवं प्रदर्शित हो।
- जल प्रदाय सुनिश्चित करने जलप्रदाय शाखा के प्रभारी अभियंता की व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदारी तय हो।
- प्रत्येक वार्ड की डेली वाटर सेफ्टी रिपोर्ट तैयार कर आयुक्त/ मुख्य नगर पालिका अधिकारी को प्रस्तुत करें।
- निकायों द्वारा जल गुणवत्ता एवं जल जनित बीमारियों के संबंध में जनप्रतिनिधियों से समन्वय कर स्थानीय स्तर पर आम नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी करें।
- स्वास्थ्य विभाग के सीएमएचओ, बीएमओ से जल जनित रोगों के संबंध में नियमित समन्वय रखें।
- पीएचई की स्थानीय जल परीक्षण प्रयोगशालाओं से जल नमूनों का नियमित अंतराल पर परीक्षण कराए।
- जल आपूर्ति से संबंधित प्राप्त शिकायतों को इमरजेंसी केटेगरी में रखें। लीकेज, दूषित जल शिकायतों का 24 से 48 घंटों के भीतर निराकरण करें।
- सीएम हेल्पलाइन में गंदा/दूषित पेयजल तथा सीवेज से संबंधित प्राप्त शिकायतों के निराकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।
- नगरीय निकायों द्वारा शहर की जल वितरण प्रणालियों के लीकेज डिटेक्शन एवं एनआरडब्ल्यू को कम करने के लिए विस्तृत डिटेक्शन सर्वे की कार्य योजना बनाए।
- संचालन-संधारण में लगे अमले की ट्रेलिंग और कैपिसिटी बिल्डिंग कराई जाए।
- जल प्रदाय एवं सीवर नेटवर्क की जीआइएस आधारित मैपिंग कराए।
- अमृत योजना अंतर्गत प्रत्येक परियोजना के क्रियान्वयन की आनलाइन मानिटरिंग एवं जीआइएस बेस्ड साइट इंस्पेक्शन कराए।
- जल वितरण प्रणाली की मात्रा एवं गुणवत्ता की आनलाइन एवं सेंट्रलाइज मानिटरिंग, स्काडा के माध्यम से की जाए।
- नगरीय निकायों की जल प्रदाय व्यवस्था का आकस्मिक निरीक्षण किया जाए।
- जल शोधन संयंत्रों में उपयोग में लाए जाने वाले केमिकल्स की गुणवत्ता निर्धारित मापदंड की हो तथा आवश्यक केमिकल्स पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो, यह सुनिश्चित किया जाए।
- उपभोक्ताओं में इस बात का प्रचार- प्रसार किया जाए कि पाइपलाइन में लीकेज होने, वाल्व / फीटिंग्स के क्षतिग्रस्त होने या ऐसे कारक जिनके कारण पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित होती है, की जानकारी प्राप्त होने पर नगरीय निकायों के अधिकारियों को इसकी सूचना दी जाए।
उपभोक्ताओं को इस बात की भी समझाइश दी जाए कि वह घरेलू कनेक्शन के पाइपों को खुला ना छोडें।
जिन नगरीय निकायों में सीवर लाइनें हैं उनके संधारण पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि सीवेज से पेयजल की गुणवत्ता खराब न हो।
जिला स्तरीय समीक्षा एवं निगरानी समिति (डीएलआरएमसी) नियमित विशेष बैठक आयोजित करें।