MP में हिंदी में मेडिकल पढ़ाई पर 10 करोड़ खर्च, 50 हजार किताबें छपीं; एक भी छात्र ने नहीं दी परीक्षा
मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम से मेडिकल पढ़ाई पर तीन साल में 10 करोड़ रुपये खर्च हुए और 50 हजार किताबें छपीं, फिर भी किसी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नह...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 14 Sep 2026 01:33:39 PM (IST)Updated Date: Mon, 14 Sep 2026 01:45:35 PM (IST)
MP में हिंदी मेडिकल पढ़ाई का हाल बेहाल। (एआई जनरेटेड)HighLights
- हिंदी मेडिकल शिक्षा पर तीन साल में 10 करोड़ रुपये खर्च।
- 50 हजार किताबें छपने के बावजूद छात्रों ने हिंदी नहीं अपनाई।
- मेडिकल छात्रों में हिंदी में कम अंक मिलने का डर।
डिजिटल डेस्क। मध्य प्रदेश में बड़े जोर-शोर से शुरू हुए 'हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई' के प्रोजेक्ट की जमीनी हकीकत बेहद निराशाजनक है। रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला सच सामने आया है कि पिछले तीन सालों में सरकार ने इस महत्वाकांक्षी योजना पर 10 करोड़ रुपये खर्च कर दिए और 50 हजार किताबें भी छाप दीं, लेकिन एक भी छात्र ने हिंदी माध्यम में परीक्षा देने की हिम्मत नहीं जुटाई।
तीन साल पहले जो योजना अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ने के लिए लाई गई थी। वह अब सिस्टम की उदासीनता और छात्रों के मन में बैठे डर के कारण बुरी तरह उपेक्षा का शिकार हो रही है।
अनुवाद और छपाई पर बहाया करोड़ों का बजट
- करीब 300 डॉक्टरों की टीम ने दिन-रात मेहनत करके 16 मेडिकल विषयों की किताबों का हिंदी में अनुवाद किया था। इस पूरी कवायद में अनुवाद पर 2 करोड़, किताबों की छपाई पर 5.5 करोड़ और कॉलेजों में स्थापित 'मंदार केंद्रों' पर 3 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
इसके बावजूद, मेडिकल छात्रों के बीच यह धारणा घर कर गई है कि अगर उन्होंने परीक्षा में हिंदी में जवाब लिखे, तो उन्हें कम अंक मिलेंगे या शून्य दे दिया जाएगा। इसी खौफ का नतीजा है कि परीक्षाओं में द्विभाषी प्रश्नपत्र मिलने के बावजूद किसी भी छात्र ने हिंदी में उत्तर लिखने का जोखिम नहीं उठाया। कहीं डिब्बों में कैद किताबें
- हिंदी को बढ़ावा देने के लिए कॉलेजों में जो 'मंदार केंद्र' स्थापित किए गए थे, उनका हाल बेहाल है। भोपाल के जीएमसी सहित कई जगहों पर इन केंद्रों में ताले लटक रहे हैं और पिछले एक साल से कार्यसमिति की कोई बैठक तक नहीं हुई है।
अधिकारियों की रुचि के हिसाब से अलग-अलग जिलों में योजना का असर भी अलग है। इंदौर मेडिकल कॉलेज में हिंदी की लाखों की किताबें डिब्बों में पैक पड़ी हैं, जबकि रतलाम में डीन डॉ. अनीता मुथा की सक्रियता के चलते हर साल पुस्तक मेला लगाकर करीब 80% किताबें छात्रों तक सफलतापूर्वक पहुंचाई गई हैं। शुरुआती उत्साह हुआ गायब
- प्रोजेक्ट की शुरुआत में मुख्यमंत्री और मंत्री स्तर पर 50 से ज्यादा समीक्षा बैठकें हुई थीं और अनुवाद करने वाली 'मंदार की टोली' का जमकर सम्मान भी हुआ था। लेकिन अब यह उत्साह पूरी तरह ठंडा पड़ चुका है। क्लिनिकल रिकॉर्ड बुक का निर्माण और शिक्षकों का प्रशिक्षण ठप है।
- इस लचर स्थिति को देखते हुए अब नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) ने राज्य सरकार से पूरे प्रयोग की विस्तृत रिपोर्ट तलब कर ली है। आयोग ने हिंदी के सैंपल पेपर, चेक की गई उत्तर पुस्तिकाएं और हिंदी चुनने वाले छात्रों का पूरा डेटा मांगा है।
इंजीनियरिंग का भी वही हश्र
- सिर्फ मेडिकल ही नहीं, हिंदी में इंजीनियरिंग (बीटेक) की पढ़ाई की स्थिति भी दयनीय है। राज्य के एकमात्र तकनीकी विश्वविद्यालय, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) ने तो हिंदी में बीटेक के लिए अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) से विधिवत मान्यता लेने की ही पहल नहीं की।
वर्तमान में पूरे प्रदेश में सिर्फ चार कॉलेजों (एक्रोपोलिस, श्री दादाजी इंस्टिट्यूट, एसजीएसआईटीएस और आईपीएस अकैडमी) के पास ही इसकी मंजूरी है, जहां कुल मिलाकर केवल 53% सीटें ही भर पाई हैं। इस मामले में आरजीपीवी के कुलपति प्रो. आलोक शर्मा का कहना है कि अब यूनिवर्सिटी की तरफ से एआईसीटीई से मान्यता और अतिरिक्त सीटों के लिए प्रयास किए जाएंगे।