
मैं मध्य प्रदेश हूं...आपकी अपनी जन्म-कर्म और मर्मभूमि। 1956 में अपने जन्म से लेकर अब तक मैंने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन मैं नीचे नहीं गिरा, बल्कि ऊपर उठता चला गया। आज मुझे मेरा देश भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भी सम्मानित नजरों से देख रही है। आइए, मैं आपको अपनी यात्रा पर ले चलता हूं...
नदी संपदा में हम समृद्ध थे, फिर विपन्न् हुए, अब फिर जाग रहे हैं
सन् 1956 में जब मध्य प्रदेश स्थापित हुआ, तब यह नदियों के मामले में बहुत समृद्ध था। मैंने अपनी नर्मदा यात्राओं में पाया कि मध्य प्रदेश को पानी के मामले में प्रकृति का विशेष वरदान मिला हुआ है। किंतु मां नर्मदा की दूसरी परिक्रमा में मुझे अप्रिय दृश्य कुछ ज्यादा ही देखने को मिले। नदी के पाट पर जगह-जगह ट्रकों के काफिले खड़े थे, जो नदी के मध्य मशीनों से निकाली जा रही रेत को ढो रहे थे।
लगा जैसे नदी की छाती में छुरा भोंका जा रहा है। जगह-जगह वृक्षों के ठूंठ देखने को मिले। वृक्ष कटने से मिट्टी का कटाव हुआ, जलग्रहण कम हुआ और नर्मदा में पानी कम होने लगा। सीमित मात्रा में नदी के संसाधन निकालना ठीक है, लेकिन मशीनों से हजार फुट के गहरे गड्ढे करना नदी की अंतड़ियां निकालने जैसा है।
एक जिम्मेदार प्रदेश होने के नाते हमें यह समझना होगा कि पानी का कोई विकल्प नहीं है। ऊर्जा के हैं - पेट्रोल, डीजल, बिजली, गैस, सौर ऊर्जा आदि। लेकिन पानी का कोई विकल्प नहीं- न दूध, न शहद, न ही और कुछ। जलम् अमृतम्। हमारे पूर्वजों के लिए प्रकृति भोग्या नहीं, पूजा रही। उनके लिए जमीन केवल मिट्टी नहीं, मातृभूमि रही। नर्मदा या अन्य नदियां सिर्फ नदी नहीं, बल्कि मां रहीं।
मगर समय के साथ इंसान ने अपनी दृष्टि बदल ली। मध्य प्रदेश के औद्योगीकरण और बढ़ती जनसंख्या के दबाव में नदियों को भोग्या स्वरूप में देखना शुरू किया गया। पिछले कुछ दशकों से तो स्थिति यह रही कि नदी जितना दे सकती है, उससे कहीं अधिक उसे लूटा-खसोटा गया।
कई बार तो ऐसा लगता रहा कि कुछ ही वर्षों में नदी का खाली खोल रह जाएगा। जो मनुष्य कभी प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और पूज्य भाव रखता था, वही आज उसका हत्यारा बन गया है। मनुष्य के खूंखार पंजों से नदी को डर लगने लगा है।
किंतु हाल ही में कुछ स्तरों पर राहत दिखाई दी है। इन वजहों से आने वाला कल थोड़ा उज्ज्वल लगने लगा है। अब हमारी समझ में आ रहा है कि अगर नदियां बचेंगी, तो ही हम बचेंगे। यदि जंगल बचेंगे, तो ही मां नर्मदा बचेगी। पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश सरकार और उसके यशस्वी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा को बचाने का काम बखूबी किया है।
हमारा मध्य प्रदेश संभवत: देश का प्रथम राज्य है, जो अपनी नदी को बचाने के लिए भगीरथी प्रयास कर रहा है। नर्मदा सेवा यात्रा इसी उद्देश्य से की गई थी। कभी प्रकृति ने संस्कृति को जन्म दिया था, आज संस्कृति का फर्ज है कि वह प्रकृति की रक्षा करे। प्राकृतिक परिवेश की रक्षा हर हाल में होनी चाहिए।