राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल । कई बार यह सुनने में आता है कि घी, मावा या हल्दी के सैंपल फेल हो गए, लेकिन फल और सब्जियों के सैंपल फेल होने की जानकारी कम सामने आती है।
दरअसल, जांच की सुविधा नहीं होने से फल और सब्जियों के सैंपल खाद्य सुरक्षा अधिकारियों द्वारा किसी शिकायत पर ही लिए जाते हैं या फिर खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा विशेष अभियान में सैंपल लेकर जांच कराई जाती है।
जांच के नाम पर खानापूर्ति
इसमें भी बहुत काम मापदंडों पर जांच हो पाती है, जैसे फल और सब्जियों में हेवी मेटल की मात्रा पता करना। सबसे महत्वपूर्ण जांच जीवाणुओं की उपस्थिति का पता लगाने की होनी चाहिए, जिसकी भोपाल स्थित प्रदेश की एकमात्र लैब में सुविधा ही नहीं है।
इससे अधिक हास्यास्पद क्या हो सकता है कि वर्ष 2008 में राज्य लैब में ट्रेनिंग के लिए जो खाद्य सुरक्षा अधिकारी आए थे, उन्हें एक कक्ष दिखाकर बताया गया था- यहां माइक्रोबायोलॉजी लैब बनाई जाएगी, पर आज भी जांच नहीं हो पा रही है।
5 करोड़ की लैब अगले साल होगी शुरू
हालांकि, एफएसएसएआई के सहयोग से 5 करोड़ रुपये से अब लैब तैयार हो गई, पर यहां जांच अगले वर्ष ही शुरू हो पाएगी। सीवेज के पानी से उगाई गई सब्जियों में ई-कोलाई, फीकल कोलीफार्म जैसे खतरनाक बैक्टीरिया होने की भी आशंका रहती है, लेकिन जांच तो दूर, सैंपल लेने की ही सुविधा नहीं है।
माइक्रोबायोलॉजी जांच के लिए सैंपल बेहद सुरक्षित तरीके से लिए जाते हैं, ताकि सैंपल लेने के बाद उनमें बैक्टीरिया या अन्य कीटाणु नहीं पनपने लगें।
निजी लैब के भरोसे जांच
खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अधिकारियों का दावा है कि कुछ निजी लैब से अनुबंध कर माइक्रोबायोलॉजी, पेस्टीसाइड्स और हेवी मेटल आदि की जांच कराई जाती है, लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से अधिकतर सैंपल सर्विलांस यानी निगरानी के लिए होते हैं। इनके फेल होने के बाद भी कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
इसकी वजह यह है कि एफएसएसएआई के नियमों के अनुसार किसी भी चीज के चार सैंपल लेने होते हैं। एक जांच के लिए भेजा जाता है। तीन को सुरक्षित रखा जाता है। मूल सैंपल खराब होने या उत्पादक, विक्रेता द्वारा दोबारा जांच की मांग करता है तो इन्हीं सैंपलों की जांच कराई जाती है।
वर्ष 2011 में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम बना पर इसमें यह नहीं बताया गया है फल और सब्जियों के सैंपल चार हिस्से में कैसे लिए जाएंगे। अन्य सैंपलों की तरह इन्हें रखने पर सड़ने लगेंगे।
किस फल में क्या हानिकारक तत्व होने का जोखिम
सेव, संतरा सहित कई फलों में वैक्स लगाए जाते हैं। कुछ निर्धारित मात्रा (पार्ट पर मिलियन -पीपीएम) में खाए जा सकते हैं। पर जांच में पीपीएम पता करने की सुविधा नहीं है।
खाद्य रंगों के साथ भी यही स्थिति
- परवल को हरा दिखाने के लिए या मिर्ची को लाल दिखाने के लिए रंग चढ़ाए जाने की बात आती है, पर जांच की सुविधा नहीं है।
- कुछ सब्जियों में ग्रोथ हार्मोन के रूप में ऑक्सीटोसिन लगाए जाने की आशंका रहती है, पर सब्जी में घुलने के बाद इसे पता करने की सुविधा भी नहीं है।
- सब्जी और फलों को कीटों से बचाने के लिए बड़ी मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, पर पेस्टीसाइट्स की मात्रा भी पता नहीं चल पाती। वह भी पीपीएम में। अंगूर में बहुत ज्यादा कीटनाशकों का उपयोग पकाने के लिए किया जाता है।
प्रति सैंपल निजी लैब को 5 से 8 हजार रुपये तक देने के बाद भी कार्रवाई नहीं
नियंत्रक खाद्य एवं औषधि प्रशासन द्वारा सैंपलों की जांच के लिए कुछ निजी लैबों से अनुबंध किया गया है। मानक तरीके से सैंपल नहीं लेने के कारण यहां भी फल-सब्जियों की माइक्रोबायोलॉजी जांचें नहीं हो पातीं।
हेवी मेटल और रसायनों की जांच हो पाती है। इसके लिए भी प्रति सैंपल 5 हजार से 8 हजार रुपये तक दिए जाते हैं। यह राशि एफएसएसएआई से मिलती है।
हमने इस संबंध में खाद्य सुरक्षा आयुक्त को पत्र सौंपकर मांग की थी फल-सब्जियों में हानिकारक तत्वों के जांच की सुविधा होनी चाहिए, पर कुछ नहीं हुआ। लैब इनसे जुड़ी जरूरी जांचें नहीं हो पा रही हैं। -पीजी नाजपांडे, अध्यक्ष, नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच