MP में 4 से 6 महीने में आ रही लैब टेस्ट रिपोर्ट, कफ सिरप और मिलावट कांड के बाद भी सुधार नहीं, सिर्फ कागजों में 323 करोड़ के प्रस्ताव
मध्य प्रदेश में जहरीले कफ सिरप और खाद्य मिलावट के गंभीर मामलों के बावजूद खाद्य एवं औषधि प्रयोगशालाएं (लैब्स) बजट, एनएबीएल प्रमाणीकरण और कर्मचारियों की कमी के कारण ठप हैं।
Publish Date: Thu, 20 Aug 2026 07:39:44 PM (IST)Updated Date: Thu, 20 Aug 2026 07:39:44 PM (IST)
मध्य प्रदेश में खाद्य सुरक्षा और दवाओं की गुणवत्ता जांच के लिए प्रयोगशालाओं (लैब्स) में रखी मशीनें और जांच में देरी की रिपोर्ट। (फाइल फोटो) नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। प्रदेश में छिंदवाड़ा के जहरीले कफ सिरप कांड और खरगोन-जबलपुर के मिलावटी हल्दी मामलों के बावजूद स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा विभाग के काम-काज में सुधार नहीं आ सका है। राज्य में फूड एंड ड्रग लेब्स को मजबूत करने और नई लैब्स को शुरू करने की योजनाएं कागजी प्रस्तावों तक ही सीमित हैं। नतीजतन, सात वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भी नई प्रयोगशालाओं में वैध सैंपलों की जांच शुरू नहीं हो पाई है। जांच रिपोर्ट आने में 14 दिनों के बजाय 4 से 6 महीने का समय लग रहा है।
बजट के बड़े प्रस्ताव, पर धरातल पर शून्य
छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड के बाद ड्रग लैब्स को मजबूत करने के लिए 211 करोड़ और खाद्य लैब्स के लिए 112 करोड़ के प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे गए थे। लेकिन सिर्फ रूटीन बजट ही मिल सका। अब एक बार फिर खाद्य एवं औषधि प्रशासन के लिए 100 करोड़ से अधिक का नया संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, जिसमें जिला कार्यालयों के निर्माण, नई मशीनों की खरीदी और लैब्स के प्रमाणीकरण की योजना है।
सालाना 40 हजार सैंपलों का कलेक्शन, जांच सिर्फ 15 हजार की
- पहले पूरे प्रदेश में केवल भोपाल स्थित एकमात्र लैब ही संचालित थी। जांच में हो रही देरी को देखते हुए वर्ष 2019 में इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में नई लैब्स का निर्माण शुरू किया गया था।
- जांच में भारी देरी: खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत सैंपल की जांच रिपोर्ट 14 दिन में आना अनिवार्य है, लेकिन इसमें 4 महीने लग रहे हैं। वहीं दवाओं के सैंपलों की जांच में 4 से 6 महीने लग रहे हैं।
- क्षमता की कमी: प्रदेश में प्रतिवर्ष सर्विलांस और वैध मिलाकर लगभग 40 हजार सैंपल लिए जाते हैं, लेकिन लैब्स की सीमित क्षमता के कारण केवल 15 हजार सैंपलों की ही जांच हो पाती है।
विभाग में मैनपावर और संसाधनों का भारी टोटा
- खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के 275 स्वीकृत पदों में से 125 पद खाली हैं (150 पदस्थ)। प्रदेश भर के करीब 70 हजार मेडिकल स्टोरों की निगरानी के लिए मात्र 79 ड्रग इंस्पेक्टर तैनात हैं।
- अधिकतर समय खाद्य एवं औषधि प्रशासन के नियंत्रक का पद अतिरिक्त प्रभार में रहता है, जिससे प्रशासनिक फैसले प्रभावित होते हैं।
- वर्ष 2008 से भोपाल लैब में माइक्रोबायोलॉजी जांच शुरू करने का दावा किया जा रहा है। FSSAI के फंड से 5 करोड़ में लैब बनकर तैयार है। लेकिन एनएबीएल प्रमाणीकरण के इंतजार में 2026 में भी यह चालू नहीं हो सकी है।
रीजनल लैब्स की वर्तमान स्थिति
- इंदौर लैब: 8.30 करोड़ रुपए की लागत से बनी इस लैब का उद्घाटन 10 माह पहले हुआ था। इसे NABL का प्रमाणपत्र मिल चुका है, लेकिन FSSAI की मान्यता न मिलने से वैध सैंपलों की जांच शुरू नहीं हो पा रही है। आठ में से अब केवल 5 जांच अधिकारी ही यहां बचे हैं। इंदौर के सैंपल अभी भी भोपाल भेजे जा रहे हैं।
- जबलपुर लैब: यहां अभी तक NABL प्रमाण पत्र ही नहीं मिला है, जिसके बाद FSSAI मान्यता देगा। प्रक्रिया में 2 से 3 महीने और लगेंगे। वर्तमान में यहां केवल दो कर्मचारी पदस्थ हैं, जबकि विभाग का दावा प्रतिवर्ष 6 हजार सैंपलों की जांच करने का है।
- ग्वालियर लैब: वर्ष 2019 में शुरू हुआ निर्माण कार्य बजट अभाव और एजेंसी की लापरवाही से 10% अधूरा है। निर्माण पूरा होने, उपकरण स्थापित करने और मान्यता मिलने में अभी कम से कम एक साल का समय लगेगा।