
डिजिटल डेस्क। एक मां नौ महीने तक अपने बच्चे को कोख में पालती है। बच्चा जन्म लेता है तो लगता है दुनिया की सारी खुशियां उसे मिल गईं। ममता से भरी थप्पी और लोरियां गाकर वो बच्चे को सुलाती है। जन्म के कुछ ही दिन होते हैं और अभी-अभी मां की लोरियों की आवाज पहचानने लगा बच्चा एक ऐसी नींद में सो जाता है, जिससे वो कभी वापस नहीं उठता। आंखों में आंसू लिए मां उसे बार-बार उठाने की कोशिश करती है, लेकिन मौत बच्चे को अपने आगोश में ले चुकी है।
ये दिल को झकझोर वाली कहानी मध्य प्रदेश की उन महिलाओं की हैं, जिन्होंने जन्म के 28 दिनों के अंदर ही अपने मासूम बच्चों को खो दिया। जनगणना निदेशालय की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) रिपोर्ट में सामने आया है कि प्रदेश में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) प्रति हजार पर 26 है। जितने चौकाने वाले ये आंकड़े हैं, उससे कहीं ज्यादा परेशान करने वाली इनकी मौत की वजह है।
इस रिपोर्ट ने देश का दिल कहे जाने मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। छोटी सी लापरवाही बच्चों की जान के लिए खतरा बन रहीं हैं और मांओं के लिए जिंदगीभर का दर्द दे रही है। नवजातों की मौत के जो कारण बताए गए हैं इसमें एक कारण कई सरकारी अस्पतालों में सीरज डिलेवरी की सुविधा का ना होना भी है। इस खास रिपोर्ट में इन्हीं पहलुओं पर पड़ताल की गई है...
विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था देखभाल ठीक से नहीं होना इसकी बड़ी वजह हो सकती है। गर्भ में जब बच्चे के शरीर का विकास होता है, इस दौरान महिलाएं कई बार खुद की देखभाल नहीं कर पातीं। कई बार महिलाओं को ऐसी बीमारियां घेर लेती हैं, जिससे बच्चे के विकास पर असर पड़ता है। जन्म लेने के बाद बच्चा में कमजोरी होती जो उसके लिए मौत का कारण बन जाती है।
गर्भ में पल रहे बच्चे के शरीर को विकास के लिए मां द्वारा किए भोजन से ही सभी पोषक तत्व मिलते हैं। गर्भावस्था के दौरान खानपान पर ध्यान न देने से बच्चे का विकास भी प्रभावित होता है। कई बार महिलाओं को इस दौरान आयरन की कमी की समस्या भी सामने आती है। डॉक्टर इस कमी को दूर करने के लिए दवाओं सहित यह भी बताते हैं कि खानें में किन सब्जियों और खाद्य पदार्थों का सेवन करना है। ऐसे में गर्भवती महिलाएं अगर इसका ध्यान नहीं रखती तो उनके बच्चे की जान को खतरा रहता है।
नवजातों की मौत के मामले में तीसरा और सबसे बड़ा कारण जो सामने आया है वो मध्य प्रदेश के अस्पतालों में गर्भवतियों के स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी का है। प्रदेश में सीजर डिलेवरी की सुविधा केवल 140 सरकारी अस्पतालों में ही है। इसकी बड़ी वजह स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों, शिशु रोग और एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की कमी है। कई बार हालात बिगड़ने पर प्रसूता को दूसरे अस्पताल में रेफर करना पड़ता है। ऐसे में महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की जान पर खतरा रहता है।
एसआरएस की रिपोर्ट के अनुसार देश में छत्तीसगढ़ के बाद मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा शिशु मृत्यु दर है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में हर साल करीब 20 लाख बच्चे जन्म लेते हैं, इनमें से 52 हजार बच्चों की 28 दिन के अंदर ही मौत हो जाती है। बच्चों के जन्म लेने के बाद कुछ ही दिनों में उनकी मौत का ये आंकड़ा चिंताजनक है। यह देश में शिशु मृत्यु दर में मध्य प्रदेश की खराब स्थिति को दर्शाता है।
रिपोर्ट में एक और चौकाने वाला खुलासा हुआ है, जिसमें यह सामने आया है कि मध्य प्रदेश में जन्म लेने वाले प्रति एक हजार बच्चों पर 41 बच्चे ऐसे होते हैं जो पांच साल की उम्र भी नहीं जी पाते। इसकी जो बड़ी वजहें सामने आई हैं उनमें सही समय पर टीकाकरण का ना होना, जन्म के बाद बीमारियों से प्रतिरोधक क्षमता का घटना और कुपोषण शामिल है।
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पूर्व डायरेक्टर एनएचएम शिशु रोग विशेषज्ञ और डॉ पंकज शुक्ला की माने तो सेप्सिस और निमोनिया की वजह से बच्चों की मौत के मामले सबसे ज्यादा सामने आते हैं। इसके लिए लेबर रूम में सुविधाओं के साथ व्यवस्था भी सुधारने की जरूरत है, जिसकी वजह से नवजातों को संक्रमण के खतरे से बचाया जा सके। इसके साथ ही गर्भवती महिलाओं के हीमोग्लोबिन, शुगर और ब्लड प्रेशर की जांच भी समय-समय पर होना जरूरी है। यह जांचे बहुत गर्भवती महिला और बच्चे के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में जन्म लेने वाले बच्चों की देखभाल सही तरीके से हो, इसके लिए उन इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं ठीक करने की जरूरत है।