
अजय गुप्ता, नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। देश में आइपीसी या भारतीय न्याय संहिता को ब्रिटिश सरकार ने 1860 में लागू किया था। आजादी के बाद इसमें परिवर्तन हुए लेकिन लागू होने के 163 वर्ष बाद आइपीसी को पूरी तरह हटाकर एक जुलाई से भारतीय दंड विधान की जगह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) लागू होने जा रही है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अमरपाल सिंह बताते हैं कि अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत में प्रचलित दंड कानून अधिकतर मुस्लिम कानून थे। भारतीय दंड संहिता का पहला मसौदा 1837 थामस बैबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता वाले प्रथम विधि आयोग द्वारा तैयार किया गया था। 1850 में ड्राफ्टिंग का काम पूरा हुआ और 1856 में इसे लेजिस्लेटिव काउंसिल के सामने पेश किया गया। भारतीय दंड विधान यानी इंडियन पीनल कोड 1860 में छह अक्टूबर को पारित हुआ था।
उसे एक जनवरी 1862 से लागू किया गया था, तब अंग्रेज शासकों ने न्यायालयीन प्रणाली के जानकारों के सहयोग से तय किया कि हत्या से लेकर दुष्कर्म तक और चोरी से लेकर मानहानि तक, हर अपराध किस स्तर का माना जाएगा, उसके लिए क्या धारा लगेगी और सजा क्या होगी।
अंग्रेज न्यायाधीश बार्न्स पीकाक ने ड्राफ्ट में आवश्यक सुधार किए। पीकाक बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट के पहले चीफ जस्टिस भी बने। वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप गुप्ता बताते हैं कि आजादी के पूर्व से जो भारतीय दंड विधान बना चला आ रहा था, उसमें कहीं न कहीं गुलामी की मानसिकता झलकती है, उसका झुकाव प्रशासन की ओर अधिक था और उसकी मंशा कहीं न कहीं दंड का प्रविधान करना रही, न कि पीड़ित को न्याय दिलाना।
1860 के बाद से आइपीसी के कई सेक्शन बदले जा चुके हैं और लगभग 75 से अधिक बार संशोधित किया जा चुका है, दहेज हत्या से लेकर कई अपराध जुड़े और कई अपराध हटे भी। नई सदी की बात करें तो वर्ष 2012 निर्भया कांड के बाद कानून में बदलाव की जरूरत महसूस हुई।
तीन फरवरी 2013 को क्रिमिनल ला अम्नेडमेंट आर्डिनेंस आया, जिसके बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 181 और 182 में बदलाव किए गए। इनमें दुष्कर्म से जुड़े नियमों को सख्त किया गया। कई छोटे-छोटे बदलावों के बाद तो हुए लेकिन अब पूरी संहिता को ही बदल दिया गया है।
विधि जानकारों के अनुसार, बीएनएस में वर्तमान में चल रही सभी धाराओं के क्रम बदल गए हैं, वहीं कई अपराध भी हटाए और जोड़े गए हैं। आइपीसी में जहां 511 धाराएं थीं, वहीं अब बीएनएस में 358 धाराएं हैं। बीएनएस में 20 नए अपराध जोड़े गए हैं और निरस्त आइपीसी के 19 प्रावधानों को हटा दिया गया है। 33 अपराधों के लिए कारावास की सजा बढ़ा दी गई है और 83 अपराधों के लिए जुर्माना बढ़ा दिया गया है। 23 अपराधों के लिए अनिवार्य न्यूनतम सजा का प्रविधान किया गया है। छह अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा की सजा पेश की गई है।