स्कूल छोड़ रहे बच्चे, शिक्षक भी कम... मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर नीति आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
नीति आयोग की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश में माध्यमिक स्तर पर 16.8% ड्रॉपआउट दर चिंता का विषय बनी। प्राथमिक स्तर पर शून्य ड्रॉपआउट उपलब्धि रही, जबकि शिक्षक कमी भी सामने आई।
Publish Date: Tue, 02 Jun 2026 09:42:13 AM (IST)Updated Date: Tue, 02 Jun 2026 09:46:03 AM (IST)
माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की बढ़ती संख्या। (फाइल फोटो)HighLights
- माध्यमिक स्तर पर 16.8 प्रतिशत छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ते।
- प्राथमिक शिक्षा में ड्रॉपआउट दर शून्य दर्ज हुई।
- 7,217 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित।
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्य प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा के मोर्चे पर सरकार ने बड़ी सफलता हासिल की है, लेकिन माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले बच्चों (ड्रॉपआउट) की बढ़ती संख्या अब चिंता का विषय बन गई है।
नीति आयोग की हाल ही में जारी स्कूल एजुकेशन सिस्टम इंडिया रिपोर्ट ने प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की कई चुनौतियों को सामने रखा है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024-25 में माध्यमिक स्तर (कक्षा 9वीं और 10वीं) पर ड्रॉपआउट दर 16.8 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो देश के कई राज्यों की तुलना में काफी अधिक है।
प्राथमिक शिक्षा में बड़ी उपलब्धि
रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश ने प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किया है। वर्ष 2024-25 में प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर शून्य दर्ज की गई है। एक दशक पहले वर्ष 2014-15 में यह आंकड़ा 10.14 प्रतिशत था। स्कूल चले हम अभियान, गृह संपर्क अभियान और अन्य सरकारी योजनाओं के चलते बच्चों को स्कूलों से जोड़े रखने में सफलता मिली है। यह उपलब्धि प्रदेश के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।
माध्यमिक स्तर पर हर छह में से एक छात्र छोड़ रहा पढ़ाई
- हालांकि प्राथमिक स्तर की सफलता के बावजूद माध्यमिक शिक्षा में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। रिपोर्ट बताती है कि नौवीं और दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों में 16.8 प्रतिशत बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ रहे हैं। इसका मतलब है कि लगभग हर छह में से एक छात्र माध्यमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पा रहा है।
- हालांकि वर्ष 2014-15 में यह दर 23 प्रतिशत से अधिक थी और पिछले दशक में इसमें कमी आई है, लेकिन वर्तमान स्थिति अब भी गंभीर मानी जा रही है। तुलना करें तो राजस्थान में यह दर 7.7 प्रतिशत, बिहार में 6.9 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 15.3 प्रतिशत है।
छठी से आठवीं तक भी बनी हुई है चुनौती
उच्च प्राथमिक स्तर यानी कक्षा 6 से 8 तक की ड्रॉपआउट दर 6.3 प्रतिशत दर्ज की गई है। वर्ष 2014-15 में यह दर 11.7 प्रतिशत थी। यानी इस स्तर पर सुधार हुआ है, लेकिन प्रदेश अभी भी कई राज्यों से पीछे है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरावस्था में बच्चों के स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए विशेष प्रयासों की जरूरत है।
हजारों स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे
- रिपोर्ट में शिक्षकों की उपलब्धता को लेकर भी गंभीर स्थिति उजागर हुई है। प्रदेश में 7,217 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक पदस्थ है। इन स्कूलों में 2.29 लाख से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में एक शिक्षक को पढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है, जिससे शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होती है।
- रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में लगभग 70 हजार शिक्षकों के पद रिक्त हैं। वहीं 463 ऐसे स्कूल भी चिह्नित किए गए हैं, जहां एक भी विद्यार्थी नहीं है, लेकिन वहां 223 शिक्षक तैनात हैं। इससे संसाधनों के असंतुलित उपयोग का मुद्दा भी सामने आया है।
आखिर क्यों छोड़ रहे हैं बच्चे स्कूल?
- शिक्षाविदों का मानना है कि ड्रॉपआउट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। आर्थिक कठिनाइयां, परिवार की जिम्मेदारियां, रोजगार की ओर बढ़ता रुझान, स्कूलों की दूरी, परिवहन की कमी, कमजोर शैक्षणिक वातावरण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सीमित उपलब्धता प्रमुख कारण हैं।
शिक्षाविद दामोदर जैन के अनुसार ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच अभी भी बड़ी चुनौती है। कई परिवार आर्थिक दबाव के चलते बच्चों को आगे पढ़ाने के बजाय काम में लगा देते हैं। सरकार का दावा, जारी रहेंगे प्रयास
- लोक शिक्षण संचालनालय के संचालक केके द्विवेदी का कहना है कि विभाग लगातार ड्रॉपआउट दर कम करने के लिए काम कर रहा है। प्राथमिक स्तर पर सफलता मिली है और अब माध्यमिक स्तर पर भी सुधार के लिए विशेष रणनीति बनाई जा रही है। हर वर्ष गृह संपर्क अभियान चलाकर स्कूल छोड़ चुके बच्चों की पहचान की जा रही है और उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षक रिक्त पदों को भरा जाए, स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं बेहतर हों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को अतिरिक्त सहायता मिले, तो प्रदेश में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर में तेजी से कमी लाई जा सकती है।