ईश्वर सिंह परमार, भोपाल। Nawab Pataudi: सबसे कम उम्र (21 वर्ष) में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान बनने वाले मंसूर अली खान पटौदी को कोई कैसे भूल सकता है। पटौदी और भोपाल नवाब परिवार से जुड़े होने व क्रिकेटर के अलावा एक शानदार शख्सियत भी उनका परिचय है। भोपाल उनके दिल में बसता था, क्योंकि यहां उनका जन्म (5 जनवरी 1941) हुआ था। मां साजिदा सुल्तान के निधन के बाद वह भोपाल नवाब की संपत्ति के केयर टेकर रहे। यही कारण है कि बचपन में काफी समय तक इसी शहर में रहे। आज उनकी बरसी है। 22 सितंबर 2011 को 70 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था।
पटौदी रियासत के 9वें नवाब थे मंसूर
हरियाणा के गुरुग्राम से 26 किमी दूर अरावली की पहाड़ियों में बसे पटौदी रियासत का इतिहास करीब 200 साल से अधिक पुराना है। सन् 1804 में स्थापित इस रियासत के पहले नवाब फैज तलब खान थे। मंसूर अली के पिता इफ्तिखार अली हुसैन सिद्दीकी, 1917 से 1952 तक इस रियासत के आठवें नवाब थे। पिता के निधन के बाद मंसूर अली खान को 9वां नवाब बनाया गया।
स्टेशन के बाहर खड़े थे, ऑटो वाला बोला- मैं छोड़ दूं तो साथ हो लिए
भोपाल नवाब परिवार और नवाब पटौदी के करीबी रहे अनवर मोहम्मद खान की जेहन में उनके जीवन से जुड़े कई किस्से कैद हैं। अनवर बताते हैं कि जब भी मंसूर दिल्ली से भोपाल आते तो स्टेशन पर वह उन्हें रिसीव करने जाते थे। प्लेन से न आते हुए मंसूर तमिलनाडु एक्सप्रेस से आते थे। ट्रेन ठीक सुबह 7.57 बजे भोपाल स्टेशन पर आती थी, लेकिन एक बार वह नहीं पहुंच पाए तो नवाब साहब खुद स्टेशन से बाहर आ गए। यह उनके इंतकाल से 5-6 साल पहले की बात है। स्टेशन के बाहर एक बुजुर्ग ऑटो वाले ने उन्हें पहचान लिया और पैलेस छोड़ने की बात कही। नवाब साहब पुराने ऑटो में बैठकर पैलेस पहुंचे। ऑटो वाले ने बताया कि उन्होंने पैलेस में ही चाय-नाश्ता कराया और फिर रुपये भी दिए।
करीबियों का करते थे बहुत सम्मान
अनवर मोहम्मद खान कहते हैं कि मंसूर अली रिश्तों का बहुत सम्मान करते थे। एक बार वह उनसे मिलने दिल्ली गए। उस समय नवाब पटौदी पत्नी शर्मिंला टैगोर व बेटे सैफ अली खान के साथ बैठे थे। जैसे ही वह पहुंचे, पटौदी गदगद हो गए। सम्मान देने के लिए सैफ अली को कुर्सी से उठा दिया। क्रिकेटर थे, लेकिन भोपाल में हॉकी खेलते थे नवाब पटौदी को खेल से बहुत लगाव था। वह क्रिकेटर थे, लेकिन हॉकी, फुटबॉल, साइकिलिंग व पोलो का भी बड़ा शौक था। उन्हें खाने और शिकार का भी शौक था। वह अक्सर भोपाल के आसपास के जंगलों में शिकार करने जाते थे।