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इंदौर हुकुमचंद मिल विवाद, ‘सिटी फॉरेस्ट’ की मांग खारिज; NGT ने हाईकोर्ट के फैसले को माना अंतिम

इंदौर के हुकुमचंद मिल परिसर को सिटी फॉरेस्ट घोषित करने और निर्माण रोकने की मांग पर एनजीटी ने याचिका खारिज की।

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Mon, 23 Mar 2026 11:02:17 AM (IST)Updated Date: Mon, 23 Mar 2026 11:02:37 AM (IST)
इंदौर हुकुमचंद मिल विवाद, ‘सिटी फॉरेस्ट’ की मांग खारिज; NGT ने हाईकोर्ट के फैसले को माना अंतिम
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने खारिज की हुकुमचंद मिल मामले में याचिका (AI Generated Image)

HighLights

  1. हाईकोर्ट के फैसले को आधार बनाया गया
  2. बार-बार याचिका दायर करने पर फटकार
  3. सिटी फॉरेस्ट की कानूनी मान्यता नहीं

नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल : राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की सेंट्रल जोन बेंच ने इंदौर स्थित हुकुमचंद मिल परिसर को “सिटी फॉरेस्ट” घोषित करने और वहां प्रस्तावित निर्माण कार्य पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि इस मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय पहले ही विस्तृत आदेश दे चुका है, इसलिए इसमें दोबारा हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

एक ही मुद्दे पर बार-बार याचिका पर नाराजगी

यह याचिका राजेन्द्र सिंह द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि हुकुमचंद मिल परिसर पिछले 30 वर्षों में प्राकृतिक रूप से हरित क्षेत्र में बदल चुका है और यह शहर के लिए शहरी जंगल जैसा कार्य कर रहा है। उन्होंने निर्माण कार्य से पेड़ों की कटाई, प्रदूषण में वृद्धि, तापमान बढ़ने और जैव विविधता को नुकसान होने की आशंका जताई थी।


हालांकि, एनजीटी ने पाया कि इसी मुद्दे और तथ्यों के आधार पर इंदौर हाईकोर्ट में पहले ही रिट याचिका दायर की जा चुकी थी, जिसे 10 सितंबर 2025 को खारिज कर दिया गया था। पीठ ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि एक ही विषय पर बार-बार याचिका दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

17.52 हेक्टेयर भूमि पर विकास का रास्ता साफ

एनजीटी के आदेश के साथ ही हुकुमचंद मिल की 17.52 हेक्टेयर भूमि पर विकास कार्य का मार्ग प्रशस्त हो गया है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि जब सक्षम उच्च न्यायालय पर्यावरणीय पहलुओं पर निर्णय ले चुका है, तो उसी मुद्दे पर पुनर्विचार का कोई औचित्य नहीं है।

‘सिटी फॉरेस्ट’ की कानूनी मान्यता नहीं

हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए एनजीटी ने कहा कि भारतीय वन अधिनियम में “सिटी फॉरेस्ट” की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है।

मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड ने इस जमीन को मिल मजदूरों और अन्य देनदारों के बकाये के भुगतान के लिए 421 करोड़ रुपये में खरीदा था, जिसका वितरण पहले ही किया जा चुका है। रिकॉर्ड के अनुसार, परिसर में केवल झाड़ियां, गाजरघास और बबूल के पेड़ हैं, जिन्हें जंगल की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

साथ ही, हाउसिंग बोर्ड ने केवल 21 सेंटीमीटर से कम घेरे वाली झाड़ियों और सूखे पेड़ों को हटाने के लिए टेंडर जारी किया है।

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