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आपकी प्लेट में रखे चावल की वजह से बढ़ रही ग्लोबल वॉर्मिंग, आईसर भोपाल की स्टडी में हुआ खुलासा

धान पानी से भरे खेतों में होती है, इसलिए इसमें ऑक्सीजन की कमी होती है। यहीं पर सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस को छोड़ते हैं।

By Digital DeskEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Fri, 11 Sep 2026 11:43:09 AM (IST)Updated Date: Fri, 11 Sep 2026 11:50:31 AM (IST)
आपकी प्लेट में रखे चावल की वजह से बढ़ रही ग्लोबल वॉर्मिंग, आईसर भोपाल की स्टडी में हुआ खुलासा
आईसर भोपाल। फाइल फोटो

HighLights

  1. पर्यावरण को लेकर एक रिसर्च लेटर प्रकाशित किया
  2. धान के खेत हर साल 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे हैं
  3. देश में चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर धान की खेती होती है

डिजिटल डेस्क, भोपाल। आपकी प्लेट में रखा चावल धान के जिन खेतों से आता है वो न सिर्फ जहरीली मीथेन गैस वातावरण में छोड़ते हैं बल्कि ये ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ा रहे हैं। आईसर भोपाल और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण को लेकर एक रिसर्च लेटर प्रकाशित किया है। इनके शोध में जो बात सामने आई है वो बहुत चौकाने वाली है।

देश के पानी से भरे धान के खेत जो दुनिया की एक बड़ी आबादी का पेट भर रहे हैं वो हर साल पर्यावरण में 97 लाख टन मीथेन गैस छोड़ रहे हैं। कार्बनडाई ऑक्साइड की तुलना में मीथेन गैस पर्यावरण में कम समय के लिए रहती है, लेकिन यह अपने अंदर गर्मी को बनाए रखती है। इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी होती है।


दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इसके लिए यूरोप कॉपरनिकस प्रोग्राम के सैटेलाइट डाटा का उपयोग किया। इसमें 10 मीटर रिजॉल्यूशन पर धान के खेत का नक्शा बनाया गया। इसमें यह सामने आया कि मीथेन गैस का उत्सर्जन सबसे ज्यादा कहां और कब होता है।

इस शोध से जुड़े आईसर के वैज्ञानिकों की माने तो अकेले मॉनसून के मौसम में बोई जाने वाली खरीफ फसल से ही देश में चावल से जुड़ी मीथेन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा निकलता है। देश के ज्यादातर इलाकों में चावल हमारे खाने की थाली का एक मुख्य हिस्सा होता है। लेकिन यही देश के जलवायु पर पड़ने वाले असर का एक बड़ा कारण निकलकर सामने आया है।

धान के खेतों से मीथेन गैस निकलने की वजह

धान पानी से भरे खेतों में होती है, इसलिए इसमें ऑक्सीजन की कमी होती है। यहीं पर सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर मीथेन गैस को छोड़ते हैं। खेती की यह प्रक्रिया बहुत पुरानी है, लेकिन इससे पर्यावरण पर लगातार प्रभाव पड़ रहा है। देश में करीब चार करोड़ हेक्टेयर जमीन पर चावल की खेती की जाती है। यह जितना लोगों की आजीविका का साधन है उतना ही हवा को नुकसान पहुंचाने वाला भी है।

मीथेन के उत्सर्जन में हो सकती है 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी

इस शोध में जो बात सामने है उसमें बताया गया है कि अगर आने वाले समय में तापमान में बढ़ोतरी होती है और बारिश का पैटर्न भी बिगड़ता है तो मीथेन गैस के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे खेती की पैदावार और इससे होने वाजी आजीविका पर भी असर पड़ेगा। इसमें शोधकर्ताओं का कहना है कि मीथेन पर इस शोध को हमें और व्यापक स्तर पर करने की आवश्यकता है।

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