
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आरोप से घिरीं मध्य प्रदेश की नगरीय विकास एवं आवास विभाग की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी को राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने तलब किया है। अनुसूचित जाति विभाग के आयुक्त ने नोटिस भेजकर छह जुलाई को समिति के सामने पेश होकर जाति के साक्ष्य पेश करने को कहा है।
आयुक्त ने सतना कलेक्टर से कहा है कि वह मंत्री को नोटिस तामील कराकर पावती उपलब्ध कराएंगे। जांच प्रक्रिया के तहत गांव व क्षेत्र में सार्वजनिक सूचना का व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। समिति ने कहा है कि इसके व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए गांव- मोहल्ले में डोंडी पिटवाई जाए ताकि कोई भी व्यक्ति साक्ष्य देने समिति के समक्ष आ सके।
आरोप है कि सतना जिले के मझोल के ग्राम हरदुआ निवासी प्रतिमा बागरी का अनुसूचित जाति वर्ग का प्रमाण पत्र संदेहास्पद है। इसका प्रयोग उन्होंने सतना जिले की आरक्षित रैगांव विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए किया था। प्रमाण पत्र की शिकायत कर जांच की मांग की गई है।
नोटिस में अनुसूचित जाति विकास कार्यालय के आयुक्त ने मंत्री प्रतिमा बागरी से कहा है कि आप 1950 की स्थिति में मध्य प्रदेश के जिला-सतना का निवासी होने और 'बागरी' अनुसूचित जाति का सदस्य होना प्रमाणित करने संबंधी साक्ष्यों एवं अभिलेखों सहित निर्धारित समय व तिथि को समिति के समक्ष उपस्थित हों। समिति की जांच और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय होगा।
मध्य प्रदेश अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव की ओर से 14 जुलाई 2003 को समस्त विभागों को आदेश जारी कर स्पष्ट किया गया था कि मध्य प्रदेश के महाकोशल, बुंदेलखंड, विंध्य क्षेत्रों में बागरी कहलाने वाले व्यक्ति अनुसूचित जाति में सम्मिलित होने की पात्रता नहीं रखते हैं। इसके बाद 19 अप्रैल 2004 को आदिम जाति अनुसंधान संस्थान के संचालक ने भी पत्र जारी करके स्पष्ट किया था कि बागरी/बागंड़ी के संबंध में भ्रम की स्थिति है।
बागरी/बागंड़ी को मध्य प्रदेश के भिंड, गिर्द, मुरैना, शिवपुरी, गुना, राजगढ शाजापुर, उज्जैन. रतलाम, मंदसौर, भैलसा, इंदौर, देवास, धार, झाबुआ एवं निमाड़ जिलों के लिए अनुसचित जाति के रूप में मान्य किया गया है। यह भी स्पष्ट किया था कि मध्य प्रदेश में निवासरत बागरी/बागंड़ी वही समूह है, जिसे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राज्य सरकार ने विमुक्त जातियों की सूची में रखा गया।
बाद में इस जाति से क्षेत्रीय बंधन को हटाकर स्थानीय रूप से बागंड़ी कहलाने वाले मालगुजार और सम्पन्न कृषकों ने संवैधानिक सुविधाएं अर्जित करने के प्रयास किए तो फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनाने के मामले सामने आए।