
डिजिटल डेस्क, भोपाल। देश का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश का सफर बेहद दिलचस्प और ऐतिहासिक मोड़ों से भरा रहा है। 15 अगस्त 1947 को भारत के स्वाधीन होने के बाद भी वर्तमान मध्य प्रदेश का स्वरूप अस्तित्व में नहीं आया था। करीब नौ साल के लंबे विचार-विमर्श और मंथन के बाद 1 नवंबर 1956 को चार अलग-अलग इकाइयों मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल राज्य और महाकोशल (सीपी एंड बेरार) का एकीकरण कर नए राज्य की नींव रखी गई।
हालांकि, राज्य निर्माण की घोषणा के साथ ही सबसे बड़ा द्वंद्व इस बात को लेकर शुरू हुआ कि आखिर इस विशाल सूबे की राजधानी किसे बनाया जाए।
राजधानी के चयन की होड़ में नागपुर, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर जैसे प्रमुख शहर आमने-सामने खड़े थे। हर क्षेत्र का अपना राजनीतिक रसूख, ऐतिहासिक गौरव और प्रशासनिक ढांचा था। आजादी से पहले ब्रिटिश हुकूमत के दौर में सीपी एंड बेरार का केंद्र रहा नागपुर शुरू में स्वाभाविक विकल्प माना जा रहा था, लेकिन राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के तहत भाषाई आधार पर नागपुर को बॉम्बे राज्य (वर्तमान महाराष्ट्र) में शामिल कर दिया गया। इसके साथ ही नागपुर की दावेदारी समाप्त हो गई।
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नागपुर के बाहर होते ही दौड़ में तीन प्रमुख नाम बचे ग्वालियर, इंदौर और जबलपुर। उस समय मध्य भारत की दो राजधानियां हुआ करती थीं शीतकालीन राजधानी ग्वालियर और ग्रीष्मकालीन राजधानी इंदौर। ग्वालियर के पास मोती महल जैसा स्थापित विधानसभा भवन, प्रशासनिक दफ्तर और दिल्ली से नजदीकी जैसे मजबूत आधार थे। वहीं जबलपुर अपनी केंद्रीय भौगोलिक स्थिति, समृद्ध संसाधनों और राज्य पुनर्गठन आयोग की प्राथमिक पसंद होने के कारण सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था।
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ग्वालियर की मजबूत दावेदारी के बावजूद सिंधिया और होल्कर रियासतों की आपसी खींचतान ने स्थिति को जटिल बना दिया। इसके अलावा, ग्वालियर का प्रदेश के उत्तरी कोने पर स्थित होना भी एक बड़ी अड़चन थी, जिससे दूरदराज के नागरिकों के लिए वहां पहुंचना कठिन माना गया।
ग्वालियर के दावे को ऐतिहासिक और राजनीतिक झटकों ने भी कमजोर किया। महात्मा गांधी की हत्या के मामले में इस्तेमाल किए गए हथियार के तार ग्वालियर से जुड़ने की वजह से केंद्र स्तर पर, विशेषकर सरदार वल्लभभाई पटेल के रुख के चलते इसे असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।
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वहीं दूसरी ओर इंदौर भी राज्य की पश्चिमी सीमा पर स्थित होने और उस दौर में सीमित रेल संपर्कों की कमी के कारण राजधानी बनने की दौड़ में पिछड़ गया।
इस त्रिकोणीय रस्साकशी के बीच भोपाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने बेहद सूझबूझ के साथ प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समक्ष भोपाल का दावा मजबूती से प्रस्तुत किया। डॉ. शर्मा ने तर्क दिया कि भोपाल पूरे प्रदेश के मध्य में स्थित है, जहां से राज्य के हर हिस्से की पहुंच सुलभ है।
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इसके साथ ही भोपाल की समशीतोष्ण जलवायु, प्राकृतिक ऊंचाई (जो इसे बाढ़ जैसी आपदाओं से सुरक्षित रखती है) और नवाबों के दौर की विशाल इमारतें इसके पक्ष में सबसे बड़े बिंदु बने। इन ऐतिहासिक इमारतों के कारण बिना किसी अतिरिक्त भारी खर्च के तुरंत प्रशासनिक सचिवालय, विधानसभा और अधिकारियों के आवास तैयार किए जा सकते थे। पंडित नेहरू ने इन सभी तर्कों को स्वीकार किया और आखिरकार भोपाल पर नए मध्य प्रदेश की राजधानी की मुहर लग गई।