
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की मुश्किल वीर भारत न्यास को एक रुपये में 500 करोड़ रुपये की जमीन देने के आरोप के मामले में बढ़ सकती है। न्यास के सचिव और मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार श्रीराम तिवारी ने पटवारी को पांच करोड़ रुपये की मानहानि का नोटिस भेजा है। साथ ही मांग की है कि तीन दिनों के भीतर वह सार्वजनिक तौर पर अपने आरोपों को लेकर माफी मांगें अन्यथा आगामी कार्रवाई की जाएगी।
उधर, पटवारी ने पलटवार करते हुए कहा कि इधर-उधर की बात करने का कोई मतलब नहीं है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को प्रदेश की जनता को यह बताना चाहिए कि हकीकत क्या है। कांग्रेस ने अपना कार्यक्रम जारी कर दिया है और हम पीछे हटने वाले नहीं हैं।
श्रीराम तिवारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश मेहता ने शनिवार को भोपाल में पत्रकारवार्ता में कहा कि दिल्ली में आयोजित प्रेसवार्ता के दौरान जीतू पटवारी ने सरकारी भूमि को श्रीराम तिवारी से जुड़े एक निजी ट्रस्ट को कौड़ियों के दाम पर सौंपने का आरोप लगाया था। न्यास को निजी ट्रस्ट बताना तथ्यात्मक रूप से गलत है। यह राज्य सरकार द्वारा गठित एक सरकारी संस्था है, जिसका संचालन शासन के निर्धारित नियमों और वैधानिक प्रविधानों के तहत होता है।
ऐसे में इसे निजी संस्था बताकर जनता के बीच भ्रम फैलाने का प्रयास किया गया। बिना किसी ठोस तथ्य के लगाए गए आरोपों से मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार एवं न्यास के सचिव श्रीराम तिवारी की व्यक्तिगत, सामाजिक और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को क्षति पहुंची है। इस कारण से जीतू पटवारी को पांच करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भेजा गया है।
नोटिस में पटवारी से सार्वजनिक रूप से अपने आरोप वापस लेने, माफी मांगने अथवा लिखित स्पष्टीकरण देने को कहा गया है। यदि निर्धारित समय सीमा में ऐसा नहीं किया जाता, तो न्यायालय में मानहानि का दावा सहित अन्य आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
वहीं, अधिवक्ता गुंजन चौकसे ने कहा कि लोकतंत्र में आरोप लगाने की स्वतंत्रता है, लेकिन तथ्यों के बिना किसी व्यक्ति या संस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना स्वीकार्य नहीं है और ऐसे मामलों में कानून अपना काम करेगा। उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह भी जीतू पटवारी के आरोपों का खंडन कर चुके हैं।
अप्रैल 2013 में मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग ने वीर भारत न्यास की स्थापना की थी। यह न्यास किसी निजी संस्था के रूप में नहीं बनाया गया था, बल्कि इसे सरकार ने सार्वजनिक उद्देश्य के लिए स्थापित किया था। उन्होंने पटवारी से पूछा कि उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, क्या उससे संबंधित एक भी दस्तावेज उनके पास हैं। राज्यपाल का अभिभाषण, कलेक्टर का आदेश, रजिस्टर्ड दस्तावेज या कोई अन्य सार्वजनिक दस्तावेज देखा है। यदि देखा तो फिर उसे नजरअंदाज क्यों किया गया।
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कांग्रेस के जिन पूर्व मुख्यमंत्रियों ने इस न्यास की अध्यक्षता की है, क्या पटवारी उन पर भी घोटाले का आरोप लगाते हैं। क्या दिग्विजय सिंह के खंडन के बाद भी कांग्रेस का यही रुख है। क्या कांग्रेस शूरवीरों, संतों और मनीषियों की स्मृति में बना रहे संग्रहालय का विरोध करती है।