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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 19, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Cattle Vaccine: गोवंशीय पशुओं में होने वाले वायरल डायरिया का टीका तैयार, 6 वर्ष तक शोध कर बनाया वैक्सीन

भोपाल स्थित निषाद ने गोवंशीय पशुओं के लिए बोवाइन वायरल डायरिया (बीवीडी) का टीका तैयार किया है। यह टीका 2 डोज में दिया जाता है और 35वें दिन से एक वर्ष ...और पढ़ें

By shashikant TiwariEdited By: Sandeep Chourey
Publish Date: Fri, 19 Jul 2024 07:00:00 AM (IST)Updated Date: Fri, 19 Jul 2024 07:00:00 AM (IST)
Cattle Vaccine: गोवंशीय पशुओं में होने वाले वायरल डायरिया का टीका तैयार, 6 वर्ष तक शोध कर बनाया वैक्सीन
इस बीमारी से युवा गोवंशीय पशु ज्यादा प्रभावित होता है। मौत की दर लगभग न के बराबर है, लेकिन उत्पादकता हानि बहुत अधिक रहती है। - (फाइल फोटो)

HighLights

  1. 2 डोज लगने के बाद 1 वर्ष तक रहेगा प्रभावी।
  2. इस बीमारी में कम हो जाता है दूध उत्पादन।
  3. पशुओं की प्रजनन क्षमता भी कम हो जाती है।

शशिकांत तिवारी, नईदुनिया, भोपाल। भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान 'निषाद' ने गोवंशीय पशुओं में होने वाली संक्रामक बीमारी बोवाइन वायरल डायरिया (बीवीडी) का टीका (वैक्सीन) तैयार किया है। यह जल्द ही बाजार में आ जाएगा।

जानें क्या है बोवाइन वायरल डायरिया

  • बीवीडी वायरस से होने वाली बीमारी है।
  • इससे पशुओं में प्रजनन रोग जैसे बांझपन, संतान में जन्मजात विकृति होने लगती है।
  • बोवाइन वायरल डायरिया के कारण कमजोर बछड़ों का जन्म होता है।
  • इस बीमारी के कारण श्वसन रोग, पेट की बीमारी होने पर पशु की मौत हो जाती है।
  • भारत में इस बीमारी का टीका अभी तक उपलब्ध नहीं था।

6 साल की मेहनत के बाद तैयार हुई वैक्सीन

संस्थान के वैज्ञानिकों ने बताया कि टीका लगाए जाने के बाद 35वें दिन से एक वर्ष तक यह सुरक्षा देता है। 2 डोज लगाई जाती हैं। दूसरी डोज पहली के 28वें दिन लगती है। संस्थान के 3 वैज्ञानिकों ने 6 वर्ष तक शोध के बाद यह टीका विकसित किया है। संस्थान के निदेशक डॉ. अनिकेत सान्याल के मार्गदर्शन में विज्ञानी डॉ. एस कालिया रासू, डॉ. एसबी सुधाकर और निरंजन मिश्रा ने इसे बनाया है।

गोवंशीय पशुओं में ज्यादा होती है ये बीमारी

इस बीमारी से युवा गोवंशीय पशु ज्यादा प्रभावित होता है। मौत की दर लगभग न के बराबर है, लेकिन उत्पादकता हानि बहुत अधिक रहती है। प्रभावित गायें बहुत कमजोर हो जाती हैं, जिससे दूध बहुत कम हो जाता है। बछड़े भी प्रभावित होने के बाद किसी काम के नहीं रह जाते।


इस बीमारी को उपचार से भी खत्म नहीं किया जा सकता, मात्र जो लक्षण दिखते हैं, उनका उपचार किया जाता है। बीमारी छींकने, खांसने और फ्लूड के संपर्क से दूसरे में पशु में पहुंचती है। लैब में जांच कर बीमारी की पुष्टि की जा सकती है। - डॉ. जयंत टपासे, अतिरिक्त उप संचालक, राज्य पशु रोग अनुसंधान प्रयोगशाला, भोपाल