
मोहम्मद अबरार खान, नवदुनिया, भोपाल। कभी गांवों के आसमान में झुंड बनाकर उड़ने वाला गिद्ध अब धीरे-धीरे फिर लौट रहा है। जिस परिंदे को लोग बरसों से सिर्फ बुजुर्गों की बातों में सुनते आए थे, उसकी उड़ान अब भोपाल की पहाड़ियों, जंगलों और गांवों में दोबारा दिखाई देने लगी है। केरवा से लेकर रायसेन के हलाली डैम तक उसके लिए सुरक्षित रहवास तैयार हो रहा है।
एक दौर था, जब गांवों के आसपास मरे हुए पशु के साथ गिद्धों का झुंड भी नजर आता था। लेकिन पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनाक ने इस परिंदे के लिए बड़ा संकट खड़ा कर दिया। मरे पशु के शरीर में दवा के अवशेष रह जाते थे, जिन्हें खाने के बाद गिद्धों की किडनी फेल होने लगी और बड़ी संख्या में उनकी मौत हुई।
इससे गिद्धों की आबादी में करीब 95 प्रतिशत तक गिरावट आई। खतरे का कारण सामने आने के बाद भारत सरकार ने 2006 में पशु-चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया।
इसके बाद जागरूकता और संरक्षण के प्रयास शुरू हुए। अब सुरक्षित दवाओं के इस्तेमाल और वल्चर सेफ जोन विकसित करने पर जोर है। विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ दूसरी एनएसएआईडी दवाएं भी गिद्धों के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं।
भोपाल से लगे रायसेन वनमंडल में गिद्धों की संख्या में खासा इजाफा दर्ज हुआ है। 2024 में 314, फरवरी 2025 में 944 और फरवरी 2026 की शीतकालीन गणना में पूरे रायसेन जिले में 1,532 गिद्ध दर्ज किए गए। हलाली डैम और आसपास का जंगल इनके लिए अनुकूल रहवास के रूप में चिन्हित किया गया है।
केरवा में वन विभाग ने वर्ष 2014 में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सहयोग से गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र शुरू किया था। यहां अब संरक्षण और प्रजनन के साथ तैयार किए गए गिद्धों को प्राकृतिक रहवास में लौटाने की तैयारी भी चल रही है। संचालक वन विहार विजय कुमार बताते हैं कि हम लगातार इस पर नजर बनाए हुए हैं , 2016 की शीतकालीन गणना में 6,999 गिद्ध दर्ज हुए थे, जबकि 2026 की शीतकालीन गणना में यह संख्या 15,641 हो गई। यानी दस वर्षों में करीब 123 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई है।
केरवा केंद्र में फिलहाल भारतीय देसी गिद्ध और सफेद पीठ गिद्ध प्रजातियों के कुल 94 गिद्ध हैं। इन्हें चरणबद्ध तरीके से सॉफ्ट रिलीज पद्धति से हलाली डैम के खुले रहवास में छोड़ा जाएगा। इन गिद्धों पर जीपीएस टैग लगाए जाएंगे, ताकि जंगल में छोड़ने के बाद उनकी हरकत और उड़ान पर नजर रखी जा सके। अभी तक मुख्य रूप से रेस्क्यू किए गए गिद्ध छोड़े गए हैं, इनमें से एक उजबेकिस्तान और दूसरा पाकिस्तान तक पहुंच चुका है। जबकि केंद्र में प्रजनन से तैयार गिद्धों को भविष्य में हलाली बांध क्षेत्र में विशेष तैयारी कर 6 माह तक कुछ गिद्द छोड़ने की योजना है।
रविवार को राजधानी से करीब 20 किलोमीटर दूर शहतगंज क्षेत्र के भैंसाया गांव में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। एक मृत पशु को खाने के लिए 100 से अधिक गिद्धों का झुंड जमीन पर उतरा। गांव के निवासी अमन के लिए यह नजारा हैरान करने वाला था। उन्होंने बताया कि खेती करते हुए उन्होंने अपने इलाके में पहले कभी इतने गिद्ध नहीं देखे। अमन कहते हैं कि गिद्धों के बारे में उन्होंने अपने पिता और दादा से ही सुना था कि ये परिंदे गांवों में मरे पशुओं को खाकर जगह साफ कर देते थे। पहली बार इतने बड़े झुंड को सामने देखकर हैरानी के साथ खुशी भी हुई।
उनका कहना है कि यह प्यारा परिंदा फिर लौट आया है। गांव में मवेशियों के मरने के बाद फैलने वाली बदबू और उससे फैलने वाली बीमारियां भी कम होगी। हम इसकी हिफाजत करेंगे और दूसरे लोगों को भी गिद्धों की उपयोगिता समझाएंगे।
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मध्यप्रदेश में गिद्धों की सात प्रजातियां पाई जाती हैं और राज्य देश में गिद्धों की संख्या के मामले में प्रमुख राज्यों में शामिल है। वर्ष 2016 से हो रही नियमित गणना में इनकी संख्या में बढ़ोतरी दर्ज हुई है। केरवा बांध स्थित संरक्षण केंद्र से लेकर हलाली बांध के खुले जंगल और अब भोपाल के आस-पास के गांवों तक गिद्धों की वापसी सिर्फ एक परिंदे की वापसी नहीं, बल्कि प्रकृति के उस सफाईकर्मी के लौटने की कहानी है, जिसकी उड़ान से गांवों का आसमान कभी पहचाना जाता था।