-किदंती के अनुसार अश्वत्थामा यहां आते हैं पूजन करने
-केमिकल वॉश व लेप से संवरेगा पुराना शिव मंदिर
-पुरातत्वीय धरोहरों को संवारने की कवायद
युवराज गुप्ता
बुरहानपुर। नईदुनिया
इंदौर-इच्छापुर राजमार्ग के कि नारे सतपुड़ा की ऊंची पहाड़ी पर ऐतिहासिक और अभेद असीरगढ़ का कि ला स्थित है। इस कि ले की खास पहचान यहां का महाभारतकालीन पुरातन शिव मंदिर है। वर्तमान में काली काई के कारण संरक्षण के अभाव में उपेक्षित हुए इस शिव मंदिर की पुरातत्व विभाग ने अब सुध ली है। मंदिर का केमिकल वाश कराकर इसे केमिकल लेप से कवर्ड कि या जाएगा ताकि इसकी पुरातन शैली की सुंदरता हमेशा बनी रहे वहीं यह संरक्षित रहे। ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर मंदिर के बाद अब इस मंदिर की भी पुरातत्व विभाग सुध ले रहा है।
उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक धरोहरों से समृद्ध बुरहानपुर जिले में कई धरोहरें प्रकृति की मार, रखरखाव में कमी सहित अन्य उपेक्षाओं से जूझ रही हैं। इन धरोहरों को संवारने के लिए पुरातत्व विभाग ने कवायद शुरु की है। इसके तहत असीरगढ़ के कि ले में स्थित पुरातन शिव मंदिर को संवारा जाएगा।
बारिश के पानी का नहीं हो सके गा असर, नहीं जमेगी काई
भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग के सहायक संरक्षक सुभाष कु मार ने बताया कि असीरगढ़ के कि ले में स्थित महाभारतकालीन शिव मंदिर के केमिकल वाश व केमिकल लेप के लिए प्रस्ताव बनाकर विभाग के वरिष्ठ कार्यालय को भोपाल भेजा गया है। जल्द ही वहां से स्वीकृति मिलकर इस पर काम शुरू होगा। विभाग के रसायन विभाग से यह सब काम होगा। केमिकल वॉश के बाद यह रासायनिक लेप लगने के बाद बारिश का पानी भी दीवार व गुंबद पर असर नहीं कर सके गा। बारिश का पानी सीधे बह जाएगा। पानी की बूंदें दीवारों पर नहीं टिकें गी। जिससे काई जमने या खार टिकने की समस्या नहीं रहेगी। मंदिर भी साफ सुथरा दिखेगा। दूर से ही इसकी चमक दिखाई देगी। उल्लेखनीय है कि असीरगढ़ के कि ले की पहाड़ी के नीचे स्थित पुराने शिव मंदिर का केमिकल वाश कर रासायनिक लेप से इसे संवारा गया है। यहां पर प्रयोग करने के बाद अब ऊपर कि ले में स्थित मंदिर पर प्रयोग होगा। उल्लेखनीय है कि भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग के रसायन विभाग की टीम ने दो माह पूर्व जिले का भ्रमण कर पुराने शिव मंदिर के केमिकल वाश व लेप को लेकर मॉनिटरिंग की थी। सहायक संरक्षक सुभाष कु मार ने बताया कि धरोहरों की साफ-सफाई का काम जारी है। धरोहरों से कटीली झांड़ियां हटाई जा रही हैं वहीं रास्तों को भी दुरुस्त कराया जा रहा है।
महाभारत के अश्वत्थामा आज भी यहां आते हैं
इतिहास के जानकार मेजर डॉ. एमके गुप्ता और होशंग हवलदार के मुताबिक ऐसी कि वदंती है कि असीरगढ़ के कि ले में स्थित पुरातन शिव मंदिर में शिवलिंग रुप में विराजमान भगवान महादेव का पूजन करने के लिए महाभारत के अश्वत्थामा आज भी यहां पर आते हैं। ब्रह्ममुहूर्त में सबसे पहले पूजन करके जाते हैं। यहां पर मंदिर के कि वाड़ खुलते ही शिवलिंग पर ताजे फू ल चढ़े हुए मिलते हैं। अश्वत्थामा अर्जुन के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र है। कि वदंती के हिसाब से इस कि ले को जब हम अश्वत्थामा से जोड़ते हैं तब हमको यह सोचना चाहिए कि इस कि ले का जो पुरातन महत्व है वह अद्भुत है। इसे संरक्षित कि या जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि इंदौर-इच्छापुर राजमार्ग पर स्थित असीरगढ़ में दो पुरातन शिव मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि दोनों ही शिव मंदिर महाभारतकालीन है। एक शिव मंदिर कि ले के नीचे हाईवे के कि नारे है तो दूसरा अभेद कि ले के शिखर पर है। महाशिवरात्रि व सावन माह में इन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। यहां दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। वर्तमान में कि ले के नीचे हाईवे कि नारे धुलकोट-बोरी मार्ग पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर पर रासायनिक लेप लगाया जा रहा है।
खुदाई व सफाई में मंदिर के कु एं में निकली थी गुफाएं
उल्लेखनीय है कि दो साल पूर्व पुरातत्व विभाग द्वारा शिव मंदिर के सामने कु एं की सफाई की गई तो वहां छठी शताब्दी की गुफाएं निकली है। ये गुफाएं भीतर ही भीतर कु छ प्रमुख स्थलों की ओर जाती है। इन गुफाओं पर रिसर्च जारी है।