
नईदुनिया प्रतिनिधि, छिंदवाड़ा। पांढुर्णा में शुक्रवार को गोटमार मेले का आयोजन हर वर्ष की तरह पूरे उत्साह के साथ हुआ।जाम नदी में पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के खिलाड़ियों के बीच पत्थरबाजी में 1185 लोग घायल हो गए। सात लोगों को अति गंभीर छोटे आई जिन्हें नागपुर रेफर किया गया। इसके अलावा 40 से अधिक लोगों को गंभीर चोटें आईं।
पांढुर्णा की ओर से आए एक युवक ने कुल्हाड़ी से झंडा काट दिया। मेला क्षेत्र और आसपास के दस सीसीटीवी कैमरे और 3 ड्रोन से निगरानी की गई। सुरक्षा के लिए सात सौ पुलिसकर्मी तैनात रहे। प्रशासन की सख्ती और धारा 144 के बावजूद नदी के दोनों तटों पर पत्थरों के ढेर देखे गए।
सुबह आठ बजे से ही दोनों पक्षों के बीच पथराव शुरू हो गया।दोपहर तक घायलों का आंकड़ा 400 के पार हो गया था, जो शाम होते, होते एक हजार से अधिक हो गया। जिनका सिविल अस्पताल में उपचार चल रहा है। गंभीर चोटों के चलते संजय धारपुरे सावरगांव, सचिन हाटेकर राधा कृष्ण वार्ड, पंकज बारमासे खारी वार्ड, सचिन नासरे पांढुरना, नितिन भादें पांढुरना, कैलाश साहू नानंदवादी और प्रीतम राउत को गंभीर चोटे आई। जिन्हें नागपुर रेफर किया गया।
शुक्रवार की सुबह पूजा अर्चना के साथ गोटमार मेले की शुरुआत हुई। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने चंडी माता मंदिर और जाम नदी में गाड़े गए पलाश के झंडे की पूजा की। इस बार दोनों पक्षों के बीच अधिक उत्साह देखा जा रहा है।
लगभग चार हजार से अधिक लोग गोटमार मेले में प्रत्यक्ष रूप से खेलते नजर आए।वही दोपहर तीन बजे तक मिले देखने वालों की संख्या 25000 से अधिक पहुंच गई।
दूसरी ओर प्रशासन ने घायलों को कैंप अस्पताल से सिविल अस्पताल तक लाने सिविल अस्पताल से नागपुर तक ले जाने की व्यवस्था सुचारू रखी थी। मेले के दौरान जिला कलेक्टर नीरज वशिष्ठ, एसपी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी कैंपों पर नजर बनाए रखे थे। सुरक्षा के लिए 7 सौ पुलिसकर्मी मौके पर तैनात थे।
गोटमार मेले आयोजन के दौरान क्षेत्रीय विधायक निलेश उइके भी पीछे नहीं रहे। दोपहर करीब 3:15 बजे मेला स्थल पहुंचकर विधायक निलेश उइके ने पांढुर्णा पक्ष की ओर से पत्थर बरसाए। इस दौरान निलेश उइके ने बताया कि गोटमार मेला पांढुर्णा के परंपरा और आस्था का प्रतीक है। हम जन भावनाओं के अनुरूप सबके साथ है।
परंपरा के अनुसार गोटमार खेल की अलसुबह सांवरगांव पक्ष के लोग कावले परिवार के घर से पलाश पेड़ का झण्डा लाकर जाम नदी के बीच लगा देते हैं। इसके बाद दिनभर पांढुर्ना पक्ष के लोग इसे तोडऩे का प्रयास करते हैं। सांवरगांव पक्ष के लोग इसे तोड़ने से रोकते हैं। हालांकि प्रशासन की समझाइश पर सूरज ढलने के बाद दोनों पक्ष झंडा निकालकर चंडी माता के मंदिर में अर्पित करते हैं। इसके बाद माता चंडी की पूजा-अर्चना कर प्रसाद वितरित किया जाता है।
इस मेले के आयोजन के संबंध में कई प्रकार की किवंदतियां हैं। इन किवंदतियों में सबसे प्रचलित और आम किंवदंती यह है कि सावरगांव की एक आदिवासी कन्या का पांढुरना के किसी लड़के से प्रेम हो गया था। दोनों ने चोरी छिपे प्रेम विवाह कर लिया।
पांढुरना का लड़का साथियों के साथ सावरगांव जाकर लड़की को भगाकर अपने साथ ले जा रहा था। उस समय जाम नदी पर पुल नहीं था। नदी में गर्दन भर पानी रहता था, जिसे तैरकर या किसी की पीठ पर बैठकर पार किया जा सकता था और जब लड़का लड़की को लेकर नदी से जा रहा था तब सावरगांव के लोगों को पता चला और उन्होंने लड़के व उसके साथियों पर पत्थरों से हमला शुरू किया।
जानकारी मिलने पर पहुंचे पांढुरना पक्ष के लोगों ने भी जवाब में पथराव शुरू कर दी। पांढुरना पक्ष एवं सावरगांव पक्ष के बीच इस पत्थरों की बौछारों से इन दोनों प्रेमियों की मृत्यु जाम नदी के बीच ही हो गई। जिसके बाद से इस मेले का आयोजन होता है।
स्थानीय जानकारों के मुताबिक, यह परंपरा करीब 400 साल पुरानी है। हालांकि इसका सटीक इतिहास स्पष्ट नहीं है, लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार पत्थरबाजी में पहली मौत 1955 में हुई थी। इसके बाद से 2025 तक कुल 13 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें एक ही परिवार के तीन सदस्य भी शामिल हैं।
इतिहास में ऐसे कई मौके आए जब इस मेले को रोकने के प्रयास किए गए, हिंसक हो उठे। 3 सितंबर 1978 और 27 अगस्त 1987 को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज, आंसू गैस और अंततः फायरिंग करनी पड़ी थी।
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