
धार से प्रेमविजय पाटिल व जयप्रकाश तापड़िया। भारतीय इतिहास सिर्फ राजा- रानी की कहानियों से नहीं बल्कि अनेक विधाओं में खासियत और संपूर्णता से भरा हुआ है। इन्हीं में से एक हैं धार जिले की बाग गुफाएं। अपनी चित्रकला के लिए विश्व प्रसिद्ध बाग की गुफाओं के भित्तिचित्रों को अजंता की चित्रकला के समकालीन माना जाता है। दोनों ही चित्रकलाएं एक जैसी चित्रांकन शैली का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस कला ने कभी भारत के साथ- साथ दक्षिण पूर्व एशिया तथा चीन की कला को भी प्रभावित किया था। यहां पूर्ण विकसित चित्रकला के चिह्न देखे जा सकते हैं। गजट के मुताबिक वास्तुकला और चित्रकारी की शैली के आधार पर इन्हें स्थूल रूप में सातवीं शताब्दी का माना जाता है।
बाग की गुफाओं के चित्रों में मुख्य रूप से लौकिक और धार्मिक जीवन से संबंधित प्रसंगों को चित्रांकित किया गया था। हालांकि इन चित्रों को काफी नुकसान हो चुका है। गुफा क्रमांक 2 जिसे रंग महल के नाम से भी जाना जाता है, में सुंदर बेल-बूटे वाले चित्र हुआ करते थे। इसमें दो मीटर ऊंचे स्थान में नृत्य करते हुए घोड़ों तथा हाथियों की शोभायात्रा के दृश्यों को चित्रित किया गया था। इसमें एक अन्य चित्र महत्वपूर्ण है। इसमें महिला को विलाप करते हुए तथा दूसरी महिला को सांत्वना देते हुए अंकित किया गया था। ऐसे कई महत्वपूर्ण दृश्य यहां अंकित किए गए थे लेकिन ये दुर्लभ चित्र अब आसानी से देखे नहीं जा सकते हैं। कुछ को सुरक्षित-संरक्षित कर लिया गया लेकिन कुछ नष्ट हो गए हैं।
नमी से बचाने हटा लिए गए भित्तिचित्र : यहां गुफा नं. 2, 3 व 4 की दीवार, छत और स्तंभों पर बड़ी संख्या में भित्तिचित्र बने थे। इन चित्रों को आर्द्रता से बचाने के लिए 1990 में गुफा से हटाने का काम शुरू किया गया था। अब ये भित्तिचित्र पर्यटकों के लिए गुफा के सामने स्थित संग्रहालय भवन में दर्शनार्थ रखे हैं। विध्यांचल की पर्वत श्रृंखलाओं को काटकर यहां नौ गुफाएं बनी हैं।
गुफा की विशेषता यह है कि यह यह समुद्र तल से 850 फीट ऊपर स्थित हैं। बाग की गुफाएं आगंतुकों के समक्ष बौद्धयुगीन वास्तुकला की कहानियां कहती हैं। कलात्मक मूल्यों के अलावा संस्कृति की धारा को पहचानने के लिए बाग की गुफाएं मूल्यवान हैं। सुरक्षा को लेकर बरती गई लापरवाही की वजह से बाग गुफाओं का मनमोहक स्वरूप मलबे में तब्दील होता जा रहा है।
ऐसे थे भित्तिचित्र
गुफा की दीवार, छत और स्तंभों पर बड़ी संख्या में भित्तिचित्र बने थे। इनमें कमोबेश सभी हल्के रंगों का प्रयोग किया गया। मुख्य रूप से नीले, पीले, काले एवं लाल रंगों का उपयोग देखने को मिलता है। सभी रंग वानस्पतिक या पत्थरों को पीसकर बनाए गए हैं। गुफा की छत पर हाथी, भैंस, पक्षी, फल-फूलों को चित्रित किया गया। सम्मान देने की मुद्रा में नर-नारी के चित्र हैं। गुफा के अंत में बुद्ध और उनके शिष्यों के चित्र थे।
इस तरह निकाले गए चित्र
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के विशेषज्ञों ने चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। निकाले गए चित्रों के पीछे लगा प्लास्टर साफ किए जाने के बाद चित्रों को मजबूती देने के लिए फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से पिछले हिस्से में माउंटिंग की गई। माउंटिंग से मोटाई देने के बाद भित्तिचित्रों को सीधा रखकर रासायनिक पदार्थो से उसकी फेंसिंग की गई। ऐसे में चित्र वाला हिस्सा अपने मूल स्वरूप में बना रहा।
ये चित्र अब संग्रहालय में अलग-अलग पैनल्स के रूप में रखे हुए हैं। भित्तिचित्रों के नीचे उनकी जानकारी का वर्णन है। गुफा नं. 2 में स्थित बौद्ध और बोधिसत्व की मूर्तियों के लगातार क्षरण को देखते हुए 4 मूर्तियों की प्रतिकृति (रेप्लिका) भी संग्रहालय के बाहर रखे गए हैं। इन चित्रों की प्रतिकृतियों के संग्रह राज्य संग्रहालय तथा धार के गुजरी महल संग्रहालय में सुरक्षित है। गुफा से मिला ताम्रपत्र और अन्य मूर्तियां ग्वालियर के संग्रहालय में रखी हैं।