
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। भोजशाला परिसर रविवार को आस्था, उत्साह और धार्मिक उल्लास से सराबोर नजर आया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा भोजशाला को मंदिर मानने और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा वर्षभर पूजा की अनुमति दिए जाने के बाद यहां मां वाग्देवी के प्रतीकात्मक स्वरूप की स्थापना की गई। हिंदू संगठनों ने इसे सनातन पुनर्जागरण का नया अध्याय बताया।
सुबह से ही भोजशाला परिसर "जय मां वाग्देवी" और "राजा भोज अमर रहें" के जयघोष से गूंजता रहा। श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों, भगवा ध्वज और धर्मध्वज के साथ भोजशाला पहुंचे। महिलाएं सिर पर कलश लेकर शामिल हुईं, जबकि युवाओं और बच्चों के हाथों में मां वाग्देवी के चित्र नजर आए।
भोजशाला परिसर का शुद्धिकरण
धार्मिक आयोजन की शुरुआत भोजशाला परिसर के शुद्धिकरण से हुई। गोमूत्र छिड़काव और गोबर से लेपन के बाद मंडल विधान सजाया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन और विशेष पूजा संपन्न हुई। मैहर के शारदा माता मंदिर से लाई गई अखंड ज्योति भी स्थापित की गई। सुबह छह बजे शुरू हुआ कार्यक्रम करीब 11:30 बजे महाआरती के साथ संपन्न हुआ। शाम को भी संध्या आरती आयोजित की गई।
1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद यह पहला अवसर
हिंदू संगठनों का कहना है कि वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद यह पहला अवसर है, जब भोजशाला में इस स्वरूप में मां वाग्देवी की स्थापना की गई है। इससे पहले हिंदू समाज को केवल मंगलवार और वसंत पंचमी जैसे सीमित अवसरों पर ही पूजा की अनुमति मिलती थी। अब प्रतिदिन पूजा-अर्चना की अनुमति को ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है।
कुछ देर रोकी गई प्रतिकृति, फिर मिली अनुमति
मां वाग्देवी की प्रतिकृति को भोजशाला परिसर में ले जाने को लेकर शुरुआती कुछ मिनटों तक सुरक्षा एजेंसी ने आपत्ति जताई। बाद में अधिकारियों से चर्चा के बाद प्रतिकृति को भीतर ले जाने की अनुमति दे दी गई।
आयोजन में धार सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर भी शामिल हुईं। भोज उत्सव समिति के पदाधिकारी, साधु-संत, जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारी भी मौके पर मौजूद रहे। कलेक्टर राजीव रंजन मीणा और एसपी सचिन शर्मा ने व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया।
लंदन से मूल प्रतिमा लाने का संकल्प
भोज उत्सव समिति के पदाधिकारियों ने घोषणा की कि अगली वसंत पंचमी तक ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत वापस लाने के प्रयास तेज किए जाएंगे। इसे भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के पुनर्स्थापन का अभियान बताया गया।
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