
शैलेंद्र लड्ढा, सुसारी (धार), नईदुनिया न्यूज। निसरपुर और उसके आसपास के क्षेत्र में सबसे बड़ी चिंता है मानवाधिकार की। आज भी लगभग500 से अधिक डूब प्रभावित परिवार टिन शेडों में रहने को मजबूर हैं। वहीं जो पुनर्वास स्थल बनाए गए हैं, वहां पेयजल, स्वास्थ्य, सड़क, नालियों, सड़क बत्ती, आंगनबाड़ी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। सम्मानजनक, गुणवत्ता पूर्ण जीवन जीने का हर मानव का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन दो साल पहले घरौंदे डूबने के बाद टिन शेड में रहने आए तहसील के 24 गांवों के हजारों परिवार दयनीय अवस्था में अपना जीवन जी रहे हैं। जिम्मेदार इन लोगों को टिन शेड में शिफ्ट करने के बाद भूल गए हैं।
सरदार सरोवर बांध के गेट साल 2017 में लगे थे। साल2019 में बांध पूर्ण रूप से भरने के बाद कुक्षी तहसील के 24 डूब के गांवों में जल प्रलय की स्थिति बन गई थी। इसके बाद शासन व एनवीडीए विभाग ने ताबड़तोड़ इन गांवों को खाली करा दिया था। कई परिवार तब, अपनी मांगों प्लाट, भूअर्जन, मुआवजा व पुनर्वास पैकेज की राशि को लेकर संघर्ष कर रहे थे, उस समय उन्हें आश्वासन की घुट्टी पिलाकर पुनर्वास स्थल व जिनके पास कोई आसरा नहीं था, उन्हें टिन शेडों में रहने को भेज दिया था।

जिए तो जिए कैसे...
कुक्षी तहसील के चार पुनर्वास स्थल निसरपुर, कड़माल, नानकबयड़ी व नर्मदानगर में लगभग 500 परिवार टिन शेडों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। ठंड के मौसम में टिन शेड दोपहर में गरम हो जाता है, तो बाहर बनाई गई झोपड़ी परिवार के लोग चले जाते हैं। परिवार में अधिक सदस्य हैं। ऐसे में 12 बॉय 12 के टिन शेड में कैसे रहे। ऐसे में कुछ सदस्यों को ठंड में बाहर सोना पड़ता है। पेयजल कभी मिलता है, कभी नहीं। बिजली कब आएगी, कब जाएगी, पता नहीं रहता। स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं की बात करना अब बेमानी लगने लगा है। टिन शेड में रहने वाले इन परिवारों को पात्र-अपात्र के नियमों में उलझाकर रख दिया है। 5से 6 बार सर्वे होने के बाद भी ये परिवार टीन शेडों में नारकीय जीवन जी रहे हैं।
अब हमारे जीवन में कोई रंग नहीं
नानकबयड़ी टिन शेड में डूब के गांव चिखल्दा की रहने वाली सुशिला बाई कहती हैं कि दो साल हो गए हैं, एक भी त्योहार की खुशी नहीं देखी है। जिंदगी अब बैरंग हो चुकी है। पीने को पानी बमुश्किल मिलता है। दो साल में एक बार भी स्वास्थ्य टीम नहीं आई। अगर कोई बीमार हो जाए, तो 5 से 10 किमी अपने साधन से जाना पड़ता है। स्कूल, आंगनबाड़ी है नहीं। ऐसे में बच्चों का भविष्य खराब हो रहा है। जब डूब से बाहर किया था, तो विभाग ने बकायदा एक रजिस्टर में नाम लिखा कि आपके घर डूब रहे हैं। उसके बाद यहां टिन शेड में आए, तो यहां भी नाम दर्ज किया। अब कहते हैं कि डूब में नहीं हो। यह कैसे हो सकता है। ड्रायवर प्रवीण जोशी कहते हैं क्या हम लोग ऐसे ही जिंदगी गुजारेंगे। दो साल से इस तरह की हालत में जिंदगी जी रहे हैं, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है।
न सड़क, न परिवहन के साधन
कुक्षी तहसील के 11 पुनर्वास स्थलों में से एक मात्र निसरपुर पुनर्वास स्थल है, जहां सड़क, बिजली व पानी के साथ सार्वजनिक आवागमन की व्यवस्था है। इसके अलावा अन्य सभी पुनर्वास स्थलों पर सड़क कच्ची है और न ही कोई सार्वजनिक आवागमन के साधन हैं। पेयजल व्यवस्था रामभरोसे है। आज भी नर्मदा घाटी विकास विभाग टैंकर चला रहा है, वह भी तब, जब पुनर्वास स्थलों की स्थाई पेयजल व्यवस्था के लिए90 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है। उसके बाद भी कई पुनर्वास स्थलों में लोग पानी के लिए तरह रहे हैं।
सर्वे किया है
जिन पुनर्वास स्थलों पर सड़क, नालियां, आगनबाड़ी भवनों की आवश्यकता है, उसके लिए सर्वे कर प्राक्कलन भेजे जा चुके हैं। साथ ही टिन शेड में जो भी पात्र परिवार हैं, उनका भी सर्वे किया जा चुका है।- आरवी सिंह, एनवीडीए लोनिवि, कुक्षी