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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 24, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

National Girl Child Day Special: कविता और भूमिका जैसी किस्मत हर बेटी की हो, शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ी रहेंगी

National Girl Child Day Special: धार जिले में पांच साल में शाला त्यागी लड़कियों का प्रतिशत 51 तक पहुंचा

By Hemant Kumar UpadhyayEdited By: Hemant Kumar Upadhyay
Publish Date: Tue, 24 Jan 2023 08:00:57 AM (IST)Updated Date: Tue, 24 Jan 2023 08:00:57 AM (IST)
National Girl Child Day Special:  कविता और भूमिका जैसी किस्मत हर बेटी की हो, शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ी रहेंगी

National Girl Child Day Special: प्रेमविजय पाटिल, धार। आदिवासी बहुल जिले में आज भी बालिकाओं के साथ दूसरे दर्जे का व्यवहार किया जाता है। उन्हें आठवीं कक्षा के बाद अंचल के कई लोग पढ़ाने के लिए नहीं भेजते हैं। ऐसे में यह शाला त्यागी हो जाती हैं। पांच साल में इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। इसका प्रतिशत करीब 51 तक पहुंच गया है। हालांकि ऐसे में कुछ निजी संस्थाएं प्रयास कर रही हैं। इसके चलते सुधार की उम्मीद बनी है। जुड़वां बहनें कविता और भूमिका सामाजिक कार्यकर्ता की मदद से 10वीं में पढ़ रही हैं।

वर्ष 2018 की स्थिति देखें तो 1325 बच्चियों ने शाला त्यागी थी जबकि वर्ष 2019 की स्थिति देखें तो यह आंकड़ा 1048 रहा। 2020 में यह आंकड़ा 1790 हो गया जबकि 2021 में शाला त्यागी बालिकाओं की संख्या 7445 पर पहुंच गई। 2022 में शाला त्यागी बच्चियों की संख्या 6594 हो गई।


आदिवासी अंचल में बालिकाएं कक्षा नौ तक नहीं पहुंच पाती हैं। इस तरह से ड्रॉपआउट की स्थिति बढ़ी है। आठवीं के बाद माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा से लेकर उनके साथ होने वाली छेड़छाड़ व अन्य घटनाओं के भय से कक्षा उन्नत नहीं करने देते हैं। ऐसे में चिंता खड़ी हो जाती है कि इन बच्चों को आखिर में किस तरह से मुख्यधारा से जोड़ा जाए।

मिली मदद तो बेटियां हाईस्कूल तक पहुंचीं

धार के बाग ब्लाक के गांव पिपरानी में रहने वाली जुड़वां बहनें कविता और भूमिका ऐसे ग्राम की रहने वाली हैं, जहां लूटपाट की घटनाएं अधिक होती हैं। गांव में सिर्फ एक प्राथमिक स्कूल है। उसके बाद की पढ़ाई के लिए सभी को 2-3 किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ता है।

ये इलाका इतना वीरान है कि लोग यहां अपने बच्चों और खासकर लड़कियों को अकेले भेजने से कतराते हैं। ऐसे में कविता और भूमिका को ग्राम में निजी संस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता का सहारा मिला तो वे पढ़ने के लिए आगे आईं। इन दोनों बेटियों ने कहा कि हमें मदद मिली तो हम आगे बढ़ पाईं और पढ़ पाईं। हम हमारी सहेलियों के लिए भी इस दिशा में प्रयास करते हैं।

बता दें कि गांव में प्रचलन लंबे समय से चला आ रहा है, हमेशा से गांव की लड़कियों को कक्षा पांच तक पढ़ा कर उनका स्कूल छुड़वा दिया जाता है क्योंकि माध्यमिक शाला दूर है और वीरान इलाके में हैं, जहां लड़कियों को भेजकर कोई भी माता-पिता ख़तरा नहीं उठाना चाहते। कविता और भूमिका के साथ भी यही हुआ जब वे पांचवीं में आईं तो उनका स्कूल छुड़वा दिया गया। दोनों बहनें अब गृहस्थी के कामों और खेती-बाड़ी में लग गईं थी। उन दोनों पर बाल विवाह का खतरा भी मंडरा रहा था।

इस क्षेत्र में गैर-लाभकारी संस्था एजुकेट गर्ल्स भी बालिका शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत है। जब संस्था के क्षेत्रीय समन्वयक रमेश बामनिया को कविता और भूमिका के बारे में पता चला तो वे उनके माता-पिता से मिलने घर पहुंचे। पिता ने बताया कि वे तो चाहते हैं कि उनकी बेटियां पढ़ें लेकिन घर से स्कूल की दूरी और बीच में सुनसान इलाके होने की वजह से वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। रमेश ने उन्हें लंबे तक समझाइश दी और सरकार द्वारा संचालित किए जा रहे कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय के बारे में बताया।

रमेश ने उन्हें बताया कि सरकार की ओर से केजीबीवी बालिकाओं को हास्टल के साथ साथ, खाने की व्यवस्था, यूनिफार्म, सुरक्षा के लिए फीमेल वार्डन भी उपलब्ध कराती है। रमेश ने दोनों बहनों के माता-पिता को आखिर मना लिया। अब कविता और भूमिका का नामांकन केजीबीवी की कक्षा छठी में कराया गया।

दोनों कक्षा 10वीं में आ चुकी हैं। कविता और भूमिका आज अपने गांव की उन चुनिंदा लड़कियों में से हैं, जिन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की है। इस बारे में कविता व भूमिका ने बताया कि हम दोनों बहनों को मदद मिली तो हमने पढ़ाई में कोई कसर नहीं रखी। हम हमारी सहेलियों के लिए भी ऐसी ही चाह रखते हैं