
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार : शहर सहित जिलेभर में रविवार को शुभ मुहूर्त में घट स्थापना के साथ नवरात्र महापर्व की शुरूआत हो गई है। अगले दस दिनों तक पूरा नगर मां की भक्ति और डांडियों की गूंज में डूबा रहेगा। हर जुबां पर जय माता दी....जय माता दी...का उद्घोष सुनाई देगा।
प्राचीन मां गढ़ कालिका मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया गया है। मंदिर के आंगन से लेकर शिखर तक रंग-बिरंगी आकर्षक लाइटें झिलमिला रही हैं। यहां प्रतिदिन अल सुबह काकड़ आरती में हजारों श्रद्धालु शामिल होकर पुण्य लाभ लेंगे।
गढ़ कालिका का प्राचीन मंदिर धार शहर की सबसे ऊंची पहाड़ी व देवी सागर तालाब के पास स्थित है। ये मंदिर धार के पंवार राजवंश द्वारा स्थापित किया गया था और ये प्राचीन भारतीय मंदिर वास्तुकला का एक अनूठा उदाहरण है। वर्ष 1770 में स्वर्गीय यशवंत राव पंवार प्रथम (वर्ष 1736 से 1761) की पत्नी सकवार बाई ने अपने पति की मृत्यु के बाद इस मंदिर का निर्माण कराया था।
देवी कालिका की प्रेरक प्रतिमा वास्तव में महाराष्ट्र के कोठे गांव से लाई गई थी। मंदिर का शिखर परमार स्थापत्य शैली का बताया जाता है। मंदिर के सामने सुंदर काले पत्थर की दीपों की श्रृंखल है। आनंद राव पंवार (वर्ष 1782 से 1807) की पत्नी मैना देवी ने भी गढ़ कालिका मंदिर के कुछ प्रमुख विकास कार्यों में योगदान दिया।
उल्लेखनीय लोगों में गढ़ कालिका मंदिर परिसर के अंदर सभा मंडप, भोजन कक्ष शामिल हैं। जाहिर तौर पर गढ़ कालिका को पंवार वंश की कुलदेवी माना जाता है। कुलदेवी की पूजा पूरे कुल द्वारा की जाती है और देश भर के भक्त गढ़ कालिका देवी के भी दर्शन और पूजन करते हैं।
देवीजी मंदिर परिसर में मेले का भी शुभारंभ होगा। यहां छोटे-बड़े झुले लग चुके है जो बच्चों के लिए मनोरंजन का केंद्र रहेगा। साथ ही यहां पर सामग्री खरीदारी के लिए दुकानें भी लगाई गई है।
श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने चाक-चौबंद सुरक्षा इंतजाम किए हैं। मंदिर परिसर और गर्भगृह तक पुलिस बल तैनात रहेगा। साथ ही मेले में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी होगी और खोया-पाया केंद्र भी स्थापित किया गया है।
धार में नवरात्र की धूम अलग ही रंग बिखेरती है। सप्तमी से शहर की रातें पूरी तरह डांडियों की ताल और भक्तिरस में सराबोर हो जाएगी। साथ ही चुनरी यात्रा भी भव्य रुप से निकाली जाएगी। शहर में इस बार 40 से अधिक स्थानों पर सार्वजनिक गरबा पंडाल सजाए गए हैं। शुरुआती छह दिन पंडालों में रात 12 बजे तक गरबे की धुन बजेगी, जबकि सप्तमी से पूर्णिमा तक पूरी रात डांडियों की गूंज रहेगी।
मां गढ़ कालिका की शयन आरती तो होती है, लेकिन पालना नहीं लगाया जाता है। पूरी नवरात्रि माता भक्तों के लिए जागरण करती है।
शारदीय नवरात्र के अवसर पर भक्तों की अपनी मां के प्रति इतनी सच्ची भक्ति रहती है कि वह तीन बजे ही स्नान करके तड़के तीन बजे से ही नंगे पांव ही मां की काकड़ आरती में शामिल होने जाते है श्रद्धालु।
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