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प्रेम विजय पाटिल, नईदुनिया, धार। सनातन के विराट वैभव का गुणगान करती राजा भोज की भोजशाला का एक-एक प्रस्तर खंड तो वाग्देवी की ऋचाएं सुनाता ही है, परिसर के भीतरी प्रांगण के मध्य में स्थित हवनकुंड शारदा सदन में सरस्वती साधना की कहानी बिना कुछ कहे भी कह देता है।
लगभग हजार वर्ष पहले इसी परिसर में वेद ऋचाओं के बीच सैकड़ों विद्यार्थी बैठकर इस हवनकुंड में आहुतियां देते हुए मां सरस्वती का आशीष प्राप्त करते थे। सरस्वती देवी के अनन्य भक्त राजा भोज ने जब 1034 ईस्वी में यहां महाविद्यालय की स्थापना की थी, उसके बाद से ही भोजशाला संस्कृत के प्रकांड विद्वानों की प्रिय स्थली बनी रही। बाणभट्ट, कालिदास, धनपाल, भास्कर भट्ट जैसे विद्वान यहां अध्ययन-अध्यापन के साथ ही यज्ञ-हवन करते हुए आहुति डालते थे।
यज्ञ में अनुष्ठान के हर भाग के लिए गणितीय माप का ध्यान रखा जाता था। मंडप का आकार कुंड के आकार पर निर्भर करता था। कुंड का आकार आहुतियों की संख्या पर निर्भर करता था। आहुतियों की संख्या उस आध्यात्मिक तपस्या (धर्म-अनुष्ठान) पर निर्भर करती थी। इस तरह से विज्ञान व गणित को ध्यान में रखकर यह यज्ञकुंड बनाया गया था। बड़ी मात्रा में घी के उपयोग को ध्यान में रखते हुए इसमें कुंड के पाषाणों में तरल पदार्थ के प्रवाह के लिए संरचना भी बनाई गई थी, इसलिए यह चौकोर रूप में बनाया गया था।
यह ऐतिहासिक हवनकुंड अब फिर अपने उसी दौर को प्राप्त करने के लिए लालायित है। सर्वे के बाद कुंड की शिलाएं भी मानों सनातन से फिर सरस्वती मंत्रों के साथ आहुति मांग रही हैं। शोधकर्ता विनायक साक्कले ने बताया कि राजा भोज मां सरस्वती के उपासक थे और बसंत पंचमी पर बड़े स्तर पर आयोजन हुआ करते थे।
उसे दौर में यहां सरस्वती यज्ञ व्यापक स्तर पर हुआ करता थे, इसलिए हवन कुंड का उस दौर में खास महत्व था। राज दरबार लगभग 500 महाविदूषियों और कवियों से सुसज्जित था। इनमें धनपाल, धनंजय, वरुचि, धनिका, उवट, वाघ आदि थे। 14वीं शताब्दी के प्रारंभ में अफगान सिपहसालार मुल्तानी ने मालवा पर आक्रमण के दौरान इस हवन कुंड और इसमें यज्ञ करने वाले विदूषियों को बड़ा नुकसान पहुंचाया था।