नईदुनिया प्रतिनिधि, डिंडौरी। डिंडौरी से जबलपुर तक निर्माणाधीन राष्ट्रीय राजमार्ग की बदहाल राइडिंग सरफेस और वाहन चालकों को लग रहे झटकों को लेकर लोकोपयोगी लोक अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है।
शनिवार को प्रथम जिला न्यायाधीश एवं लोकोपयोगी लोक अदालत के अध्यक्ष डीएस मंडलोई के समक्ष सुनवाई के दौरान सड़क की स्थिति अच्छी बताने वाली विभागीय रिपोर्ट पर सवाल उठे।
न्यायालय ने कार्यपालन यंत्री, लोक निर्माण विभाग, राष्ट्रीय राजमार्ग को दो माह के भीतर सुधार कार्य कराकर न्यायालय को अवगत कराने के निर्देश दिए। निर्धारित अवधि में सुधार नहीं होने पर विभागीय जांच एवं लोकायुक्त जांच प्रस्तावित किए जाने की चेतावनी दी गई।
सुनवाई के दौरान उपस्थित कार्यपालन यंत्री ने सड़क निर्माण में अनियमितताओं के आरोपों को निराधार बताते हुए न्यायालय के समक्ष जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की। विभाग की ओर से सड़क की स्थिति अच्छी होने तथा निर्माण एजेंसी की परफॉर्मेंस गारंटी अवधि में होने और ठेकेदार द्वारा लगातार रखरखाव किए जाने की जानकारी दी गई।
इस पर आवेदनकर्ता अधिवक्ता सम्यक जैन एवं केके सोनी ने आपत्ति लेते हुए कहा कि केवल रिपोर्ट में सड़क को अच्छी बता देने से उसकी वास्तविक गुणवत्ता प्रमाणित नहीं हो जाती। जमीनी स्थिति अलग है। सड़क की राइडिंग सरफेस खराब होने के कारण वाहनों में झटके लग रहे हैं, जिससे यात्रियों को परेशानी के साथ सड़क सुरक्षा का भी सवाल खड़ा हो रहा है।
अधिवक्ताओं ने न्यायालय को बताया कि परफॉर्मेंस गारंटी निर्माण कार्य के बाद की जवाबदेही से संबंधित है। इसका अर्थ यह नहीं कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता से समझौता किया जाए। यदि अर्थवर्क, डब्ल्यूएमएम, सीआरएम सहित आधारभूत कार्य निर्धारित मानकों के अनुसार नहीं किए जाते हैं तो अंतिम राइडिंग सरफेस पर उबड़-खाबड़पन और झटकों जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। वर्तमान सड़क की स्थिति इन्हीं गंभीर सवालों की ओर ध्यान आकर्षित करती है।
पुल-पुलियों की एप्रोच पर सेटलमेंट से अनड्यूलेशन की स्वीकारोक्ति
सुनवाई के दौरान कार्यपालन यंत्री ने स्वीकार किया कि कुंडम-शहपुरा मार्ग खंड में विद्यमान पुल-पुलियों की एप्रोच पर सेटलमेंट होने के कारण अनड्यूलेशन उत्पन्न हुए हैं, जिनका सुधार कार्य कराया जा रहा है। विभाग की ओर से सड़क की स्थिति अच्छी होने के दावे और दूसरी ओर एप्रोच में आई इन तकनीकी खामियों को लेकर वास्तविक स्थिति के समुचित परीक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यपालन यंत्री द्वारा यह बताए जाने पर कि सड़क का निरीक्षण प्रभारी मंत्री द्वारा भी किया गया है, न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रभारी मंत्री को बुलाने और फोटो सेशन पर खर्च होने वाली राशि यदि सड़क के गुणवत्तापूर्ण निर्माण में लगाई जाती तो आज न्यायालय के सामने खड़े होने की स्थिति नहीं बनती और न ही शिकायत यहां तक आती। न्यायालय ने रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय को गुमराह नहीं करने की हिदायत भी दी।
न्यायालय ने सड़क की कमियों के सुधार के लिए दो माह का समय देते हुए कार्यपालन यंत्री को सुधार कार्य कर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। निर्धारित समय में अपेक्षित सुधार नहीं होने पर संबंधित विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और विभागीय जांच एवं लोकायुक्त जांच की कार्रवाई प्रस्तावित किए जाने की चेतावनी दी गई।
नल-जल योजना में भी विभागीय दावे पर सवाल, एक माह का समय
जनहित से जुड़े दूसरे मामले में ग्राम पंचायत देवरा अंतर्गत हंसनगर एवं साकेत नगर की नल-जल प्रदाय योजना पर सुनवाई हुई। कार्यपालन यंत्री ने न्यायालय में जवाब प्रस्तुत कर बताया कि सभी बसाहटों में नियमित रूप से शुद्ध पेयजल आपूर्ति की जा रही है और वर्तमान में पानी की कोई समस्या नहीं है।
इस पर अधिवक्ता सम्यक जैन एवं के.के. सोनी ने आवेदक पेंशन एसोसिएशन के सदस्यों को न्यायालय के समक्ष उपस्थित कराकर वस्तुस्थिति रखी। आवेदक पक्ष ने विभागीय रिपोर्ट को वास्तविक परिस्थितियों के विपरीत बताते हुए आरोप लगाया कि नागरिकों को नियमित पेयजल उपलब्ध नहीं हो रहा है तथा रिपोर्ट के माध्यम से वास्तविक समस्या को छिपाया जा रहा है।
मामले में न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए एक माह के भीतर पेयजल आपूर्ति की समस्या का निराकरण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। साथ ही योजना में ठेकेदार को अब तक किए गए भुगतान की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने को कहा, ताकि योजना के क्रियान्वयन और भुगतान की स्थिति स्पष्ट हो सके।
न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित अवधि में जनोपयोगी कार्य नहीं हुए और आम नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ा तो जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जा सकती है। सुनवाई के दौरान विभागीय जांच, लोकायुक्त जांच और जेल तक की चेतावनी दिए जाने की बात सामने आई।
अब सुधार और वास्तविक परिणाम पर रहेगी नजर
सड़क और पेयजल, दोनों ही मामले सीधे आम नागरिकों के जीवन, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े हैं। न्यायालय के निर्देशों के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि सड़क की वास्तविक कमियों का तकनीकी सुधार होता है या नहीं, तथा हंसनगर और साकेत नगर के घरों तक नियमित पेयजल पहुंचता है या नहीं।
विभागीय रिपोर्ट और नागरिकों के अनुभव के बीच सामने आए अंतर ने जवाबदेही का महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है। अब केवल आश्वासन या कागजी रिपोर्ट नहीं, बल्कि धरातल पर सुधार और उसकी सत्यापन योग्य स्थिति ही इन मामलों में वास्तविक परिणाम तय करेगी।
इसी लोक अदालत में आवारा कुत्तों के आतंक तथा शहर के तालाब में सीवर लाइन डालने से संबंधित मामलों की सुनवाई भी प्रस्तावित थी। इन दोनों मामलों में विस्तृत कार्रवाई एवं आदेश की जानकारी फिलहाल अपेक्षित है।