Alha Udal Sward ग्वालियर से जोगेंद्र सेन। बुंदेलखंड के सबसे बड़े वीर सपूतों आल्हा-उदल की कहानियां तो आपने सुनी होंगी। लेकिन क्या आपको पता है कि कई युद्ध लड़ने वाले वीरों की तलवार कहा हैं। तो आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में एक ऐसी जगह हैं जहां लोग जमीन के अंदर दबे एक बड़े से तलवारनुमा पत्थर को आल्हा-उदल की तलवार बतोते हैं। ग्वालियर से 20 किमी दूर बेहट रोड पर बसे हस्तिनापुर के एक खेत में ये बड़ा साथ पत्थर दबा है। क्षेत्र के लोगों के बीच यह किवदंती प्रचलित है कि पत्थर की यह तलवार बुंदेलखंड के वीर महोबा के आल्हा-ऊदल की है। इसका हत्था बाहर दिखाई देता है, जो किसी साधारण मनुष्य के हाथ में नहीं आ सकता। आल्हा-ऊदल वीर गाथाएं आज भी बुंदेलखंड में हर जगह सुनने को मिल जाती हैं। आल्हा-ऊदल का ग्वालियर से नजदीकी रिश्ता होने के प्रमाण इतिहास में मिलता भी है। माना जाता है कि वीर सपूतों की मां देवल ग्वालियर के राजा दलपत की पुत्री थीं।

हस्तिनापुर के खेत में दबी उनकी तलवार को लेकर कई बातें प्रचलित हैं, हालांकि इनका प्रमाणित इतिहास अप्राप्त है। पुरातत्व विभाग के अधिकारी हस्तिनापुर के पास एक तलवार के खेत में दबे होने की बात स्वीकार करते हैं, लेकिन यह किसकी है, इसका प्रामाणिक इतिहास होने से इंकार करते हैं। तलवार को न तो पुरातत्व विभाग ने संरक्षित करने का कोई प्रयास किया है और न ही इसकी प्रामाणिकता के लिए कोई खोजबीन की है।

ग्रामीणों ने तार फेंसिंग कर तलवार को रखा है सुरक्षित : उटीला से बेहट जाने वाले मार्ग पर हस्तिनापुर गांव बसा है। गांव से कुछ ही दूरी पर एक खेत में लोहे की तार फेंसिंग के बीच तलवार जमीन में दबी है। बाहर से इसके हत्था ही दिखाई देता है। इसका हत्था इतना मोटा है कि साधारण मनुष्य के हाथ में आना आसान नहीं है। तलवार को देखने के लिए यहां जो लोग आते हैं वे इसे घिसकर भी देखते हैं कि यह पत्थर की है, या फिर धातु की। घिसने पर तलवार धातु की ही लगती है।

ऐसे थे आल्हा-ऊदल : बुंदेलखंड वीर सपूतों की जननी है। आल्हा खंड की रचना राजा परमार के दरबार के कवि जनिकनाथ ने की थी। ऐसा माना जाता है कि आल्हा सुनकर आज भी लोगों की धमनियों में रक्त दौड़ने लगता है। दोनों भाइयों की वीरगाथाएं 12वीं 13 वीं शताब्दी की बताई जाती हैं। ऊदल के रणभूमि में वीरगति को प्राप्त होने के बाद भाई आल्हा ने गुरु गोरखनाथ के आदेश पर मां शारदा के सामने तलवार की नोक टेढ़ी कर दी थी। माना जाता है कि आल्हा आज भी मां शारदा मंदिर के पट खुलने से पहले पूजा करने के लिए आते हैं।

तलवार के संबंध में यह मान्यता

क्षेत्र के लोगों का मानना है कि यह तलवार आल्हा-ऊदल की है। मान्यता है कि आल्हा-ऊदल के आसमान में विचरण करते समय यह जमीन पर गिरी और यहां धंस कर रह गई। बताया जाता है कि दोनों भाई आसमान में विचरण करने की विधा जानते थे।

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